कैसे वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में जीवन को संभव बनाया?

कैसे वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में जीवन को संभव बनाया

जमीन से 400 किलोमीटर दूर आकाश में “अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन” है। यह स्पेस स्टेशन पिछले 23 सालों से हमारी जमीन के आसपास घूम रहा है। यह अंतरिक्ष स्टेशन देखने में बहुत छोटा लगता है। लेकिन वास्तव में इसका आकार एक फुटबॉल स्टेडियम जैसा है। और इसका कुल वजन 4,20,000 किलोग्राम है, जो लगभग 300 गाड़ियों के वजन के बराबर है। लेकिन सवाल यह उठता है कि फुटबॉल के मैदान जितना बड़ा स्टेडियम, स्पेस स्टेशन जमीन से अंतरिक्ष में कैसे ले जाया गया?

इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (आईएसएस) अब तक की सबसे बहुमूल्य मानव निर्मित वस्तु है। इस स्पेस स्टेशन को बनाने में कुल 150 बिलियन डॉलर खर्च हुए थे। आईएसएस का मकसद है, इसमें रहने वाले अंतरिक्ष यात्री बिना गुरुत्वाकर्षण के कैसे रहते हैं? उन्हें भोजन, पानी और सबसे महत्वपूर्ण ऑक्सीजन कैसे मिलता है? और ISS को जमीन से अंतरिक्ष में कैसे चला गया? इन सभी चीजों को आप आज के आर्टिकल में जानेंगे।

इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन का उद्देश्य

आईएसएस वैसे तो एक फ़ुटबॉल मैदान जितना फैला हुआ है, जिसमें से ज्यादातर हिस्सा इसमें लगाए गए सोलर पैनल हैं। लेकिन आईएसएस का हिस्सा जहां एस्ट्रोनॉट्स रहते हैं, वह जगह भी 6 बेडरूम के जितना बड़ा है।

आईएसएस हमारी पृथ्वी के आसपास लगभग 27500 किलोमीटर प्रति घंटा की गति से घूम रहा है। यह गति इतनी अधिक है कि आईएसएस 24 घंटे में 16 बार पूरी पृथ्वी का चक्कर लगाता है। लेकिन यह बात और है, कि पिछले 23 वर्षों में एक बाद भी अपनी कक्षा से विचलित नहीं हुआ है।

आईएसएस और उसमें रहने वाले अंतरिक्ष यात्रियों का अंतरिक्ष में केवल एक ही उद्देश्य होता है और वह प्रयोग करना है। आईएसएस में संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस द्वारा निर्मित प्रयोगशाला मौजूद हैं, जिन्हें अंतरिक्ष प्रयोगशालाओं भी कहा जाता है। इन प्रयोगशालाओं में, अंतरिक्ष यात्री जमीन से लाई गई सामग्री पर प्रयोग करते हैं और देखते हैं कि वे अंतरिक्ष में कैसे प्रतिक्रिया करते हैं।

ISS की मदद से जमीन पर आने वाली प्राकृतिक आपदाओं का पूर्वानुमान लगाकर काफी नुकसान से बचा जा सकता है। पृथ्वी के अलावा मंगल जैसे ग्रह पर मानव के लिए कितना संभव हो सकता है। इसके लिए आईएसएस की मदद से काम किया जा रहा है।

इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के अंदर क्या है?

आईएसएस पर कुल 6 अंतरिक्ष यात्री हैं, जिनके रहने और काम करने के लिए एक कैप्सूल है। जो आपस में एक दूसरे से जुडी हुई है। स्नान से लेकर खाने-पीने तक, मनोरंजन से लेकर व्यायाम तक। इन कैप्सूल के अंदर अंतरिक्ष यात्रियों के लिए सभी सुविधाएं मौजूद हैं।

अगर कोई चीज गैरमौजूद है, तो वह ग्रेविटी है। गुरुत्वाकर्षण की कमी के कारण ये अंतरिक्ष यात्री ISS में अपना वजन महसूस नहीं कर सकते हैं। और न ही उन्हें बैठने और लेटने का कोई एहसास होता है। वह अपने कैप्सूल से दूसरे कैप्सूल में जाने के लिए खुद को धक्का देता है और अलग अलग वस्तुओं को पकड़ कर सुपरमैन की तरह उड़ते हुए जाता है।

उनके पास खाने के लिए बहुत सारी चीज़ें उपलब्ध होती है, लेकिन यह भोजन जमीन पर पर पकने वाले खाने नहीं, बल्कि यह पके पकाये, डिब्बाबंद भोजन होते है। हर दिन हम जमीन पर जो भी काम करते हैं, वह अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण की कमी के कारण पूरी तरह से अलग शैली में किया जाता है।

जैसे पानी पीना, दांतों को ब्रश करना, वाशरूम का इस्तेमाल करना और व्यायाम करना। क्योंकि अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष में बहुत आलसी हो जाते हैं। इसलिए, उनके पास एक विशेष प्रकार की एक मशीन होती है। जिस पर रोजाना दो घंटे व्यायाम करना इन अंतरिक्ष यात्रियों के लिए जरूरी है।

उसी तरह, अंतरिक्ष यात्री स्नान करते हैं लेकिन पानी के बिना। उनके पास विशेष शैम्पू और साबुन होते हैं जिन्हें शरीर पर लगाने के लिए पानी की आवश्यकता नहीं होती है। शैम्पू या साबुन को केवल एक सूखे तौलिये से पोंछ दिया जाता है।

अनुसंधान और प्रयोग के अलावा, ये अंतरिक्ष यात्री ISS का भी ध्यान रखते हैं। अगर कभी उन्हें स्पेस स्टेशन के बाहर कुछ काम करना होता है, तो वे स्पेस स्टेशन से बिना स्पेस सूट के बाहर नहीं जा सकते। क्योंकि अंतरिक्ष में एक ही समय में 250 डिग्री तापमान गर्म होता है और शून्य से -250 डिग्री तक ठंडा होता है।

यदि ज्यादा गर्मी होगी, तो यह एक ही समय में मानव शरीर को जला करके राख कर देगा। और अगर गर्मी नहीं होगी, तो यह मानव को एक पल में ही बर्फ जैसा जमा देगा। यही कारण है कि यह स्पेस सूट बनाया गया था जिसमें ऑक्सीजन, प्रेशर और गर्मी सर्दियों के बचाओ का तंत्र मौजूद होता हैं। आईएसएस में अंतरिक्ष यात्रियों को सोने के लिए छोटे छोटे काबिन्स उपलब्ध होते हैं। जहां वे खुद को स्लीपिंग बैग के अंदर बंद करके आराम से सो सकते हैं।

अंतरिक्ष यात्री, अंतरिक्ष में खाना कैसे खाते है?

6 अंतरिक्ष यात्रियों के लिए सुबह का नाश्ता, दोपहर का भोजन और फिर रात के खाने का सामान, 6 से 7 महीने तक का उपलब्ध रहता है। यानी, सात महीने के लिए, कुल 3780 भोजन बना कर आईएसएस तक पहुंचा दिया जाता है।

हेरात की बात यह है कि सिर्फ 1 किलोग्राम भोजन को आईएसएस तक पहुंचने की कीमत लगभग $10,000 है। इस भोजन को कोई भी शेफ तैयार नहीं करता है, बल्कि इस खाने को नासा के खाद्य वैज्ञानिक अंजाम देते हैं। नासा के खाद्य वैज्ञानिक की चुनौती यह था, कि उन्हें अंतरिक्ष यात्रियों के लिए भोजन तैयार करना था ।

जो वजन में भी कम हो , जिसे सात महीने तक स्टोर करने के लिए रेफ्रिजरेटर की आवश्यकता नहीं होती हो और इन खानों में भी आवश्यक सभी पोषण होते हो। इसके लिए, यह भोजन, वैज्ञानिक, खाना पकाने के बाद फ्रीज सुखाने की तकनीक के माध्यम से उन्हें फ्रीज़ करते है। जिसकी वजह से इनमें से 97% पानी निकाल दिया जाता है। और भोजन का वजन सिर्फ 3% रहता है।

अब इस भोजन को पैकिंग मशीन के जरिये न सिर्फ पैक किया जाता है, बल्कि इसके अंदर से सारी हवा भी निकाल ली जाती है। सारा खाना एक पार्सल में अच्छी तरह पैक करके नासा के सप्लाई मॉड्यूल (सिगनस) में रख कर रवाना किया जाता है। लगभग 48 घंटे की सफर के बाद सिगनस यह खाना लेकर आईएसएस पहुँच जाता है। यह तो हो गयी खाने की बात, अब बात करते है, पानी की।

अंतरिक्ष यात्री, अंतरिक्ष में पानी के पीते है?

आईएसएस पर अंतरिक्ष यात्री जमीन पर रहने वाले इंसानों के मुकाबले में सिर्फ 1 प्रतिशत पानी इस्तेमाल करते हैं। आईएसएस में हाई टेक वाटर रीसाइक्लिंग सिस्टम मौजूद है। जो आईएसएस में मौजूद खराब पानी को भी फ़िल्टर करके पीने के काबिल बना देता है।

आपको यह बात जान कर हैरानी होगी कि जो पानी अंतरिक्षयात्री, आईएसएस में पीते हैं। वह होता तो बिलकुल साफ़ है, लेकिन असल में वह पानी आईएसएस में मौजूद ह्यूमन वेस्ट को रीसायकल करके वापस साफ़ किया जाता है। यहाँ तक कि इनको जो पसीना भी निकलता है, वह भी रीसायकल सिस्टम उसको सोख करके फिर उसी को फ़िल्टर करके वापस इस्तेमाल के काबिल बना देता है। इस तरह आईएसएस में पानी के इस्तेमाल को 99% बचाया जाता है।

अंतरिक्ष यात्री, अंतरिक्ष में सांसे कैसे लेते है?

अंतरिक्ष यात्री, अंतरिक्ष में सांस लेने के लिए आर्टिफिशियल ऑक्सीजन का इस्तेमाल तो करते हैं। लेकिन यह ऑक्सीजन स्पेस में कैसे पहुंचाया जाता है? आखिरकार ऑक्सीजन का भी वजन होता है। हर इंसान एक दिन में 840 ग्राम का ऑक्सीजन इस्तेमाल करता है। यानि अंतरिक्ष में 6 अंतरिक्ष यात्री 6 महीनो में 1000 किलोग्राम ऑक्सीजन इस्तेमाल करते हैं।

यह 1000 किलोग्राम ऑक्सीजन इनको जमीन से नहीं भेजा जाता। बल्कि आईएसएस में ऑक्सीजन बनाने का भी एक सिस्टम मौजूद है। नासा के मुताबिक स्पेस स्टेशन में एलेक्ट्रोल्य्सिस के द्वारा ऑक्सीजन बनाया जाता है। यानि सोलर पैनल से मिलने वाली बिजली को पानी से गुजार कर ऑक्सीजन तैयार किया जाता है।

इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन कैसे बनाया गया?

आईएसएस का कुल वजन 420000 किलोग्राम है, जो पिछले 21 सालो से कभी भी खली नहीं रहा। फूटबाल जितना बड़ा मैदान यह स्पेस स्टेशन काफी अलग अलग मॉड्यूल को जोड़ जोड़ कर बनाया गया था।

हैरान करने वाली बात यह है, कि यह सारे मॉड्यूल कभी भी जमीन पर एक साथ नहीं जुड़े। 1998 में पहली बार लांच होने वाला स्पेस स्टेशन कुछ अलग ही दिखता था। लेकिन वक़्त के साथ साथ इसमें नए मॉड्यूल जुड़ते गए और आखिर कार 13 सालों की मेहनत के बाद। यानि 2011 में आईएसएस अपनी फाइनल शेप में आ गया।

इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के कुछ रोचक तथ्य 

  • इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन, सोलर पैनल्स के जरिये एक दिन में 120 किलोवाट बिजली बनाता है। यह इतनी जायदा बिजली है, जितनीं 40 घरों में इस्तमाल होती है।
  • आईएसएस के अंदर कुल 50 कम्प्यूटर्स लगे हैं। जो पूरे स्पेस स्टेशन को चलाते हैं।
  • इस स्पेस स्टेशन में कुल 2 बाथरूम्स, 6 सोने के लिए कैप्सूल्स और एक जिम मौजूद है।
  • 1998 से अब तक आईएसएस में अब तक 230 अंतरिक्षयात्री जा चुके हैं। जो कि 18 अलग अलग देशो से है।
  • किसी भी आपातकालीन में एक स्पेस क्राफ्ट जमीन से सिर्फ 4 घंटे के समय में आईएसएस तक पहुँच सकता है।
  • स्पेस वाक के दौरान अंतरिक्षयात्री को एक दूसरे की आवाज भी सुनाई नहीं दे सकती। क्यूंकि आवाज हमारी कानों तक हवा के जरिये पहुंचती है, जो अंतरिक्ष में मौजूद नहीं है।
  • चाँद के बाद आसमान में सबसे ज्यादा चमकने वाली चीज़ इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन है। जिसको जमीन से देखने के लिए टेलिस्कोप की भी जरूरत नहीं।
  • 24 घंटों के दौरान आईएसएस में मौजूद अंतरिक्ष यात्री 16 सूर्य उदय और 16 सूर्यास्त देख सकते हैं।

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