क्या इसरो अगला अंतरिक्ष सुपर पावर होगा?

क्या इसरो अगला अंतरिक्ष सुपर पावर होगा?

इसरो एक ऐसी स्पेस एजेंसी है जिसे आज कौन नहीं जनता। अपने कुछ खास मिशन और बड़ी सफलताओं की वजह से नासा बाकि की स्पेस एजेंसीज से काफी ज्यादा लोकप्रिय है। हमारी दुनिया की सबसे बड़ी स्पेस एजेंसी की शुरुवात सन 1958 में हुई थी। और जो आज एक स्पेस पावर के रूप में जानी जाती है।

रोसकोसमोस, ऐसी एजेंसी है जो नासा को काफी लम्बे समय से कड़ी टक्कर देती आयी है। लेकिन इस 21वी सदी में एक और स्पेस एजेंसी अपनी सफलताओ की वजह से काफी उभर रही है ,जो है हमारी भारत की स्पेस एजेंसी इसरो। दोस्तों, आइये आज के इस आर्टिकल में हम जानते हैं कि क्या हमारा भारत आने वाले समय में एक स्पेस पावर बनने वाला है।

इसरो की स्थापना

हमारी भारतीय स्पेस एजेंसी इसरो की स्थापना सन 1969 में विक्रम साराभाई द्वारा की गयी थी। जिन्हे आज हम भारतीय स्पेस प्रोग्राम के पिता के नाम से भी जानते हैं। जहाँ इसरो की स्थापना अपोलो 11 मिशन के एक महीने बाद हुई थी। इसरो का कोई भी इरादा नहीं था कि वह अमेरिकी स्पेस एजेंसी के क़दमों को किसी तरह से भी अनुसरण करे।

हमारी भारतीय स्पेस एजेंसी इसरो का सबसे पहला लक्ष्य था। सैटेलाइट्स को बनाना और उनको लांच करने के लिए लांच व्हीकल्स का निर्माण करना। अपने इसी लक्ष्य को इसरो ने अपने स्थापना के करीब 6 सालों बाद 19 अप्रैल 1975 को अपने पहले सॅटॅलाइट को हमारे पृथ्वी के ऑर्बिट में भेज दिया। इस सॅटॅलाइट को बनाना इसरो के वैज्ञानिकों के अनुमानों से काफी ज्यादा आसान और काफी ज्यादा तेज़ रहा।

इसरो द्वारा बनाए गए, सबसे पहले सॅटॅलाइट का नाम था आर्यभट। और जिसे लांच करने के भारतीय स्पेस एजेंसी ने सोवियत संघ समाजवादी गणराज्य की मदद ली। आर्यभट को लांच करने के पांच सालों बाद सन 1980 तक इसरो ने अपने पहले लांच व्हीकल को भी तैयार कर लिया था। जिसे हम एसएलवी3 के नाम से जानते हैं। तब से आज तक इसरो ने कई बड़ी बड़ी खोजें की हैं और कई रिकार्ड्स को भी तोडा है।

चंद्रयान 1

इन खोजें और रिकार्ड्स की लिस्ट कुछ इस तरह से है। सन 2008 में इसरो ने अपने पहले मून मिशन चंद्रयान 1 को इसरो के पीएसएलवी एक्सएल की मदद से लांच किया। यह मून मिशन दो हिस्सों में बांटा गया था। एक मून ऑर्बिटर और एक मून इम्पैक्टर। भारतीय इसरो का यह चंद्रयान मिशन अपने मिशन गोल्स को पूरा कामियाब करने में काफी सफल रहा।

इसने चाँद के सतह पर खनिज पदार्थ को ढूंढा। इसने चाँद की 3डी स्थलाकृति भी की। और इसी के साथ इसने चाँद पर कुछ ऐसा भी खोज जिससे नासा के कई बिलियन डॉलर के मिशन खोज नहीं पाए थे। इसने चाँद सतह पर पानी को खोजा, जो की अपने समय के हिसाब से काफी बड़ी खोज थी। और जिसे नासा द्वारा भी पुष्टि किया गया।

मंगलयान

इसके बाद सन 2013 में इसरो ने अपनी पहली मार्स मिशन को अंजाम दिया, जिसे मंगलयान नाम दिया गया। सन 2014 में यह मंगलयान सफतापूर्वक मंगल ग्रह के सतह पर उतारा गया। जिसके साथ भारत वह चौथा देश बन गया, जिसने मंगल ग्रह तक अपनी पहुँच बना ली थी।

इसरो से पहले नासा और सोवियत यूनियन जैसी स्पेस एजेंसी थी। जो मंगल ग्रह तक पहुँच पायी थी। इसी के साथ इस मंगलयान को और भी ज्यादा खास बनाने वाली बात यह थी कि इसरो तब तक वह अकेली स्पेस एजेंसी थी। जिसने अपनी पहली बार में ही अपने अंतरिक्षयान को मंगल ग्रह तक पहुंचा दिया था।

भारत के मंगल मिशन का कुल वजन महज 450 करोड़ रूपए था। जो कि बाकि के मंगल मिशन के मुकाबले कई गुना कम था। तुलना के तौर पर नासा का मंगल मिशन के बजट 716 मिलियन डॉलर था। जो कि भारतीय मंगलयान के बजट से कई गुना ज्यादा था।

इसके बाद सन 2017 में इसरो ने एक काफी बड़े रिकॉर्ड को तोडा। जो था एक मिशन में सबसे ज्यादा सॅटॅलाइट को लांच करना। और अपने इस मिशन में इसरो ने कुल 104 सॅटॅलाइट को एक ही राकेट के साथ लांच किया।

चंद्रयान 2

इसके बाद 2019 में इसरो ने अपने दूसरे लूनर मिशन चंद्रयान 2 को लांच किया। जो कि इसरो का एक ऐसा मिशन था, जिसके दौरान पूरी दुनिया की निगाहें हमारे भारत पर थी। इस चंद्रयान 2 मिशन में इसरो ने एक ऑर्बिटर, एक लैंडर और एक रोवर को चाँद पर भेजा था।

लेकिन लैंडर से संपर्क टूटने की वजह से वह चाँद की सतह से टकरा गया। हालाँकि चंद्रयान 2 का ऑर्बिटर आज के चाँद के ऑर्बिट में है। और जो चाँद के कई नयी रहस्यों का पता लगा कर उनका समाधान निकाल रहा है।

सीके बावजूद भी इसरो के पास अन्य कोई भी स्पेस एजेंसी की तुलना में कही अधिक सफलता दर है। इसमें से कुछ कारण है इसरो के अंतरिक्ष यान के सॅटॅलाइट से और राकेट के डिज़ाइन से। और कुछ अन्य स्पेस एजेंसी के द्वारा उसी मिशन के तरीके को हासिल करने के बाद इसरो का उन्हें प्रदर्शन किया जाना।

उदहारण के लिए हम बात करें सोवियत यूनियन की। तो यह 1971 में जाकर एक सफलतापूर्वक मंगल मिशन को पूरा कर पाया था। जो कि उनके 1960 में किये गए पहले बार के 11 सालों बाद मुमकिन हो पाया।

छोटे बजट के साथ बड़ी सफलता

जो इसरो के मंगलयान मिशन से 43 साल पहले हुआ था। हालाँकि इसरो रूस और अमेरिका से सीधी स्पर्धा नहीं कर रहा। और इसका बजट भी इतना ज्यादा नहीं है कि यह उनसे किसी भी तरह की प्रतियोगिता कर पाए। इसीलिए इसरो हमेशा से लागत कुशल और प्रभावी लागत होने का उदहारण देता आया है। इसरो अंतरिक्ष खोज में काफी कम रफ़्तार से चलता आया है। जिससे कम से कम गलतियां की जाये। और जिनसे मिलने वाले परिणाम काफी ज्यादा बड़े हो।

कुछ ही वर्षों में इसरो ने प्राइवेट स्पेस फर्म के साथ काम करना शुरू कर दिया है। जो इन अंतरिक्ष स्टार्टअप को अमेरिकन या यूरोपियन स्पेस एजेंसी की साथ अक्सर महंगी भागीदारी का विकल्प प्रदान करता है। हमारी आज की आधुनिक अंतरिक्ष यात्रा का केंद्र बनाने के लिए इसरो 1960 में विक्रम साराभाई द्वारा दिए गए उसी लक्ष्य को अनुसरण रहा है। जो है कि छोटे बजट के साथ बड़ी सफलता हासिल करना।

इस लक्ष्य को अनुसरण करते हुए, इसरो अपने गगनयान मिशन पर काम कर रहा है। जो कि इसरो का पहला क्रू मिशन होगा, जिसे सन 2022 में लांच किया जायेगा।

गगनयान मिशन

अगर बात करें इस मिशन के प्रगति की तो यह मिशन ऑन टाइम है। अगर भारत का यह गगनयान मिशन पूरी तरह से सफल होता है। तो भारत वह चौथा देश बन जायेगा जिसने अपने किसी अंतरिक्ष यात्री को अपनी ही अंतरिक्षयान से अंतरिक्ष में भेजा है। 20230 तक इसरो पृथ्वी के चारो ओर इसकी कक्षा में 100 से अधिक एक्टिव सॅटॅलाइट वाली चौथी स्पेस एजेंसी है।

कुछ मायनो में इसरो अंतरिक्ष में अधिक से अधिक मुख्य आधार बनता जा रहा है। लेकिन अभी भी कई ऐसे तरीके हैं, जिनमे सुधार किया जा सकता है। हमे इसरो के अभी तक के सफर को देख कर स्पष्ट हो गया है कि इसरो की नीव बेहद ठोस है। और इसरो एक सबसे कामियाब अंतरिक्ष यात्रा वाले इतिहास वाली स्पेस एजेंसी है। अगर हम देखें तो भारत 1947 में आजाद हुआ था। और तबसे इसरो की प्रगति काफी अविश्वसनीय है।

21वी सदी में सामान्य रूप से पूरी दुनिया में अंतरिक्ष खोज में रूचि दिखाई है। लेकिन शायद हमारे भारत में यह रूचि पूरी दुनिया से कही अधिक है। चन्द्रमा के मूल दौर में अमेरिकी और सोवियत संघ से स्पर्धा करने के लिए इसरो की स्थापना बहुत ही देर बाद हुई थी। लेकिन अमैरिका, रूस और चीन आने वाले भविष्य में नए चाँद मिशन की योजना बना रहे हैं।

गगनयान, मंगलयान2, कई और मिशन

जिसके दौरान भारत विश्वास के साथ इस दौड़ में प्रवेश करेगा। इसरो फ़िलहाल के लिए अपनी गगनयान, मंगलयान2, कई और मिशन पर काम कर रहा है। आने वाले भविष्य में अपनी उसी प्रभावी लागत और उच्च सफलता दर के साथ इसरो जल्द ही एक स्पेस पावर बन जायेगा।

नासा जैसे बड़े स्पेस एजेंसीज आज तक भारतीय चाँद और मंगल ग्रह जैसे मिशन द्वारा इकठे किये गए डाटा का इस्तेमाल अपनी नयी खोजो की पुष्टीकरण के लिए करती आयी है। इन बड़ी स्पेस एजेंसीज से 15 गुना बजट के साथ इसरो पूरी दुनिया के लिए चर्चा का विषय बना हुआ है। और जल्द ही भविष्य में हमारा भारत एक स्पेस सुपर पावर बन जायेगा।


जरूर पढ़ें: चाँद का रहस्य क्या है? चाँद की उत्पत्ति कैसे हुई?

Leave a Comment