क्या पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र कमजोर हो रहा है?

क्या पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र कमजोर हो रहा है? हमारी यह धरती एक बहुत बड़ी सी चुंबक है, एक बड़ी सी चुंबक की पट्टी है। जिस तरह एक चुंबक की पट्टी के आस पास एक अदृश्य चुम्बकीय क्षेत्र होता है। उसी तरह इस धरती के चारो ओर चुम्बकीय क्षेत्र स्तिथ है।

चलिए एक एक चुंबक की पट्टी के जरिये जानते हैं। जैसा कि हम जानते हैं कि इसमें दो पोल्स होते हैं। पहला, साउथ पोल और दूसरा नार्थ पोल। इसमें यह चुम्बकीय क्षेत्र नार्थ पोल से निकलती हुई, साउथ पोल तक जाते हैं।

इसी तरह पृथ्वी की चुम्बकीय क्षेत्र, नार्थ पोल से साउथ पोल तक सफर करती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि चुम्बकीय क्षेत्र उत्त्पन्न कैसे होती है? धरती के पोल्स कहाँ पर हैं? हम इंसानो को इन चुम्बकीय क्षेत्र से कितना फायदा होता है? और सबसे ज्यादा जरुरी सोशल मीडिया पर यह दावा किया जा रहा है कि धरती की चुम्बकीय क्षेत्र धीरे धीरे कमजोर होती जा रही है। मतलब क्या क्या यह सच है?

अगर ऐसा हुआ तो क्या हम सभी इन्सान खत्म हो जायेंगे? जानने के लिए आज के इस आर्टिकल को पूरा पढ़े। हमने आज के इस आर्टिकल में सभी सवालों के जवाब बताये हैं। तो अगर आप इन सभी सवालों के जवाब जानना चाहते हैं, तो आज के इस आर्टिकल को पूरा पढ़ें।

जियोमैग्नेटिक पोल 

अगर आप एक चुंबक की पट्टी को किसी रस्सी की मदद से मुक्त भाव से लटका देंगे। तो इसका नार्थ पोल धरती के साऊथ पोल की तरफ घूम जायेगा। और इसका साउथ पोल धरती के नार्थ पोल की तरफ हो जायेगा। धरती के नार्थ पोल को हम जियोमैग्नेटिक नॉर्थ पोल कहते हैं। और साउथ पोल को जियोमैग्नेटिक साउथ पोल कहते हैं। यह चुम्बकीय क्षेत्र धरती के अंदर से जियोमैग्नेटिक नॉर्थ पोल से बाहर अंतरिक्ष की ओर निकलती है। और जियोमैग्नेटिक साउथ पोल में घुसती है।

लेकिन एक चुंबक की पट्टी की तुलना में यह चुम्बकीय क्षेत्र काफी कमजोर होती है। धरती की चुम्बकीय क्षेत्र 25 से 65 माइक्रो टेस्ला की होती है, मतलब 10^(-3) टेस्ला होती है। लेकिन एक चुंबक की पट्टी की चुम्बकीय क्षेत्र 10^(-2) टेस्ला होती है।

हमारी धरती चुम्बकीय क्षेत्र को बनती कैसे है?

अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर हमारी धरती इन चुम्बकीय क्षेत्र को बनती कैसे है? हमारी धरती के अन्तर्भाग में, यानिकि मेन्टल से लेकर धरती के सेण्टर तक करीब 3878 किलोमीटर तक आयरन और दूसरे तत्वों के मिश्र धातु स्तिथ है। इसे हम दो भागों में बाँट सकते हैं। पहली है भीतरी कोर, जो ठोस धातु और रेडियोएक्टिव तत्व से बनी हुई है। और दूसरी होती है, बाहरी कोर जो कि तरल है। इस बाहरी कोर में आयरन के मिश्र धातु, तरल रूप में होते हैं।

अब होता यूँ है कि भीतरी कोर के धातु और रेडियोएक्टिव तत्व बहुत ज्यादा मात्रा में ऊष्मा को बनाते है। जिसका तापमान 5730 डिग्री सेल्सियस के करीब होता है। यह ऊष्मा भीतरी कोर से निकाल कर बाहरी कोर में जाती है। बाहरी कोर में, यह वहां स्तिथ तरल लोहे की मिश्र धातु को मोशन करने में मदद करती है। इस मोशन के कारण वहां पर बिजली क्षेत्र बनती है। और जैसा कि अपने बचपन में पढ़ा ही होगा कि बिजली क्षेत्र, चुंबकीय क्षेत्र को बनती है।

धरती के द्वारा चुंबकीय क्षेत्र को बनाने की इस प्रक्रिया को डाइनेमो या फिर जियोडायनामो कहा गया है। धरती की चुंबकीय क्षेत्र एक चुंबकीय द्विध्रुवीय से दिखाई जाती है। जो इसके घूर्णी अक्ष के 11 डिग्री पर झुकी हुई है। अगर साधारण भाषा में बात करें, तो आप मान सकते हैं कि धरती की घूर्णी अक्ष पर 11 डिग्री एंगल बनाते हुए एक बढ़ सी चुंबक की पट्टी रखी हुई है। आपको बता दूँ कि भूचुंबकीय क्षेत्र हमेशा एक ही जगह पर नहीं होते। बल्कि इनमे थोड़े थोड़े बदलाव होते रहते हैं।

जियोमैग्नेटिक पोल का बदलना 

साल 2015 के आंकड़ों के अनुसार धरती का जियोमैग्नेटिक नॉर्थ पोल कनाडा में था। और साइबेरिया की तरफ स्थान परिवर्तन कर रहा था। जबकि जियोमैग्नेटिक साउथ पोल अंटार्टिका के किनारे पर है। यह पोल्स हर साल अपनी जगह थोड़ी थोड़ी बदलते रहते हैं। और कई हजारों साल के बाद एक बार ऐसा मौका आता है जब पोल्स प्रतिलोम होने लगते हैं। मतलब धरती की पूरी चुंबकीय क्षेत्र उलटी चलने लगती है। इन पोल्स के प्रतिलोम होने के आंकड़ों को हम चट्टानों और समुद्रों के बीच कुछ पैटर्न से स्टडी कर सकते हैं। इस स्टडी को पुराचुम्बकत्व कहते हैं।

ऐसा कहा जाता है कि आखिरी बार धरती के पोल आज से करीब 7,80,000 साल पहले प्रतिलोम हुए थे। पृथ्वी के इतिहास में ऐसा एक बार नहीं बल्कि कई बार हो चुका है। पर क्या आप जानते हैं कि अगली बार ऐसा कब होने वाला है? इसके बारे में वैज्ञानिकों के पास कोई भी जवाब नहीं है। मतलब यह आज ही या फिर किसी भी पल में हो सकता है और सौ साल बाद भी हो सकता है। इसके बारे में कोई भी नहीं जनता।

और हमे यह भी नहीं पता कि इसका अंजाम क्या होने वाला है? क्या ऐसा होने पर धरती पर जीवन मौजूद रहेगा? कोई नहीं जनता। हो सकता है कि हम धरती वासी इस बदलाव को अनुकूल बना लें। या फिर यह भी हो सकता है कि हम हमेशा के लिए खत्म हो जाये। अब आप कल्पना करें कि जिस धरती पर आप खड़े हैं, उसके नीचे ऐसे कितने सारे जटिल प्रक्रिया चल रही है। जो कल के दिन हमारा अंत कर सकती है। पर क्या आप जानते है कि यही चुंबकीय क्षेत्र हमारी धरती को और हमे बचा भी रही है?

चुंबकीय क्षेत्र हमारी धरती को और हमे बचा भी रही है?

जब हमारे सूरज से निकलने वाली सौर हवाएँ धरती की तरफ आती है, तो उनमे ढेर सारे चार्ज कण होते हैं। यह चार्ज कण, धरती की ओज़ोन की परत से टकराकर उसे बर्बाद कर सके हैं। और आप तो यह जानते ही हैं कि ओज़ोन की परत हमे सूरज से आने वाले पराबैंगनी किरणे से बचती है। तो अगर यह बर्बाद हो गया तो यह सब कुछ खत्म कर देगा। लेकिन यहीं पर इसको रोकने का काम करता है, धरती का चुंबकीय क्षेत्र। हमारे धरती के चुंबकीय क्षेत्र, सौर हवाएं के चार्ज कणों’ को प्रतिबिंबित कर देती है।

इसका उदहारण हम अपने पडोसी ग्रह मंगल पर भी देख सकते हैं। धरती की तरह मंगल ग्रह की चुंबकीय क्षेत्र इतनी मजबूत नहीं है। इसी वजह से सौर हवाएं उसके वातावरण के आयन्स को चुरा रहे हैं। और मंगल ग्रह के वातावरण में कार्बोंडिऑक्सीड की कमी हो रही है।

क्या धरती की चुंबकीय क्षेत्र सच में कमजोर हो रही है?

अब हम जानते हैं कि क्या धरती की चुंबकीय क्षेत्र सच में कमजोर हो रही है? तो इसका जवाब है, हाँ। धरती की चुंबकीय क्षेत्र कमजोर हो रही है। पिछले करीब 200 सालो में धरती अपने चुंबकीय क्षेत्र के 9% शक्ति खो चुकी है। यह चुंबकीय क्षेत्र की कमी अफ्रीका से साउथ अमेरिका के बीच देखा गया है।

वैज्ञानिको का मानना है कि अगर इसी रेट से चुंबकीय क्षेत्र की कमी होती रही तो अगले करीब 1600 सालो में धरती अपने चुंबकीय क्षेत्र को पूरी तरह खो बैठेगी। लेकिन यहाँ एक फ़ैक्टर यह भी है कि पिछले करीब 7000 सालो से यह बदलाव औसत ही बना हुआ है। मतलब ऐसा नहीं है कि यह कोई निश्चित पैटर्न को फॉलो कर रहा है। कभी यह ज्यादा हो जाता है और कभी कम। और पोल्स भी तो लगातार अपनी जगह बदल रहे हैं। चुंबकीय क्षेत्र के खत्म होने का सीधा मतलब यह होता है कि पोल्स प्रतिलोप जायेंगे।


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