क्या सौरमंडल में दो सूरज हैं?

क्या सौरमंडल में दो सूरज हैं?: हमारा सौरमंडल कई सारे रहस्यों से भरा हुआ है। इस ब्रह्माण्ड में बाइनरी और ट्रिनरी सौरमंडल, यानिकि दो या तीन सितारों वाले सौरमंडल काफी साधारण है। लेकिन हमारे सौरमंडल का सूरज अकेला ही है। पर बहुत सारे वैज्ञानिक ऐसा मानते हैं कि आज से करोड़ो साल पहले हमारा सूरज अकेला नहीं था। बल्कि एक नेमसिस नाम का तारा भी हमारे सौरमंडल में हुआ करता था।

आज के इस आर्टिकल में हम आप सभी को नेमसिस के बारे में अच्छे से पूरी जानकारी देने वाला हूँ। आज हम जानेंगे कि नेमसिस का कॉन्सेप्ट क्या है? और वैज्ञानिक किस आधार पर इसके होने की बात करते हैं? क्या नेमसिस आज भी हमारे सौरमंडल में स्थित है? या फिर यह दूर कहीं अंतरिक्ष की सैर कर रहा है?

25 करोड़ साल के इतिहास में

साल 1984 में, चिकागो विश्वविद्यालय के दो जीवाश्म विज्ञानी। डेविड रौप और जैक सिकोस्की, ने अपने खोज में दावा किया कि जब हम पिछले 25 करोड़ साल के इतिहास में धरती में सामूहिक विनाश पर अनुसंधान करते हैं। तो हम हमे इसमें आवधिकता दिखती है।

मतलब लगभग हर 2.6 करोड़ साल बाद एक सामूहिक विनाश एक बार होता है। डेविड रौप और जैक सिकोस्की ने बहुत कोशिशे कि लेकिन वह अपनी खोज में किये गए इस दावे को साबित नहीं कर सके। मतलब उन्हें इसका कोई संभावित कारण समझ नहीं आया। आखिर में उन्होंने मान ही लिया कि यह किसी गैर स्थलीय यानिकि धरती के बाहर के फैक्टर के कारण हो रहा है।

इस बात पर दुनिया भर के वैज्ञानिकों के अलग अलग टीम ने इस पूरी मैकेनिज्म की खोज करने में लग गए। कई सालो के खोज के बाद लुसियाना विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डेनियल व्हीटमायर और अल्बर्ट जैक्सन। और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्केले के तीन वैज्ञानिक मार्क डेविस, रिचर्ड म्युलर और पीट हट। इन दोनों ही विश्विधालय के वैज्ञानिक की टीम में से सभी ने अपनी अपनी थ्योरी पेश की।

लेकिन इन दोनों ही थ्योरी का सार यही था कि हमारे सूरज का एक साथी सितारा भी है। जो ऊट क्लाउड में या फिर उसके पार, करीब 1.5 लाइट ईयर के दूरी पर स्तिथ है। इसकी ऑर्बिट बहुत ज्यादा दीर्घ वृत्ताकार है। और हर 2.6 से 2.7 करोड़ साल में यह ऊट क्लाउड के ऑर्बिट करने वाले क्लाउड को अपने गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में फसा कर सौरमंडल के अंदर डाइवर्ट कर देता है।

सामूहिक विनाश का कारण

इससे धरती से टकराने वाले कमेंट्स की संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ जाती है। और यही धरती पर सामूहिक विनाश का कारण बनता है। इस परिकल्पना को नेमसिस या डेथ स्टार परिकल्पना नाम दिया गया। अब इससे पहले कि मैं आपको नेमसिस परिकल्पना के बारे में और अच्छे से बताऊं। आपको यह जरूर जान लेना चाहिए कि आखिर ऐसा कौन से कारण है जो नेमसिस की होने की ओर इशारा करता है।

पहला कारण तो मैं आपको बता ही चुका हूँ। कि हर 2.7 करोड़ साल बाद धरती पर एक सामूहिक विनाश की जो बात कही जा रही थी। उसके पीछे सूरज के किसी साथी तारे का हाँथ हो सकता है।

सेडना

यहाँ दूसरा कारण यह है कि सेडना की ऑर्बिट। सेडना, हमारे सौरमण्डल में स्तिथ एक ट्रांस नेप्च्यूनियन वस्तु है। जो करीब 85 खगोलीय इकाई के दूरी पर स्तिथ है। साल 2003 में, जब इसकी खोज की गयी थी। उसी समय इसकी खोज करने वाले खगोल विज्ञानी माइकल इ ब्राउन, ने कहा था। कि सेडना जहाँ पर है, उसे वहां पर होना ही नहीं चाहिए था। इसको सूरज के एक ऑर्बिट को पूरा करने में करीब 11400 साल लगते हैं। यह अपने ऑर्बिट में कभी भी सूरज के इतने करीब नहीं आता कि वह उससे प्रभाव हो पाए। और कभी भी सूरज से इतनी दूर नहीं जाता कि यह दूसरे सौरमंडल के सितारे से आकर्षित हो जाये।

माइकल इ ब्राउन का दावा था कि सौरमंडल के बाहर कोई विशालकाय चीज़ तो जरूर है। जो सेडना के इस असामान्य होने का जिम्मेदार है। यहाँ पर इन्होने इसका एक और कारण दिया था। उनके अनुसार या तो काल्पनिक ग्रह 9 के कारण था। या फिर प्राचीन समय में हमारे सौरमंडल के पास से दूसरे तारे गुजरे थे। जिन्होंने सेडना के ऑर्बिट पर अपना प्रभाव डाला। इस तरह अगर हम माइकल ब्राउन की बातों को माने तो नेमसिस हमारे सूरज का कोई साथी तारा नहीं था। बल्कि यह कोई दूसरे सौरमंडल का एक तारा था।

अब हम यह जानते है कि उन दोनों यूनिवर्सिटी के दोनों खगोलीय दल ने इसके होने के बारे में क्या क्या तर्क दिए थे। कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय के खगोलीय दल का कहना था कि नेमसिस एक लाल बौना तारा है। जिसका स्पष्ट परिमाण 7 से 12 के बीच होगा। यानिकि यह बहुत ज्यादा डिम होगा। इसी कारण से हम इसकी दूरी को आसानी से नहीं समझ पा रहे हैं।

लेकिन अगर ऐसा है, तो इसे हमारे स्टार कैटलॉग में तो जरूर होना चाहिए था। इसी टीम के एक मेंबर रिचर्ड मुलर ने बताया कि अगर नेमसिस एक बौना तारा तो हम इसे लंबन विधि से कवर कर सकते हैं। यह सो चीज़ के स्पष्ट स्थिति से किसी चीज़ के सटीक स्थिति को समझने का तरीका होता है।

बर्नार्ड स्टार

धरती से करीब 10 लाइट इयर्स दूर स्थित बर्नार्ड स्टार को इसी तकनीक से 1916 में खोजा गया था। जबकि उसका स्पष्ट परिमाण केवल अनुचित है। मतलब वह हमेशा एक ही ऑर्बिट में एक जैसे समय में नहीं चलता। यही कारण है कि उसके उचित गति को कभी नहीं समझा जा सका।

पर अगर हम इस तर्क पर ध्यान दें, तो यह तो रौप और सिकोस्की के विरुद्ध है। क्यूंकि उन्होंने तो कहा था कि सामूहिक विनाश में एक आवधिकता है।

लुसियाना विश्वविद्यालय की टीम के अनुसार नेमसिस एक लाल बौना तारा नहीं बल्कि ब्राउन बौना तारा है। ऐसे तारे को हम सामान्य उपकरणों से नहीं खोज सकते है। यह काफी ठन्डे होते हैं। और उन्हें अवरक्त में ही खोजै जा सकता है।

साल 1986 में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के द्वारा इसको खोजने की कोशिश की गयी थी। लेकिन उन्हें कुछ भी हासिल नहीं हुआ। 1997 से 2001 के बीच अमेरिका के कैरिसोना में 2 माइक्रोन आल स्काई सर्वे नाम का एक खगोलीय सर्वेक्षण किया गया था। इसमें कुल 173 ब्राउन बौने तारों को खोजा गया था। जो सौरमंडल से काफी दूरी पर मौजूद थे। लेकिन इनमे से एक भी नेमसिस नहीं निकला।

नासा का वाइज मिशन

फरवरी 2011 में नासा के वाइज मिशन के दौरान भी कई सारे बौने तारों को खोजा गया था। यह ग्रह धरती से 20 लाइट इयर्स तक की दूरी पर स्थित थे। इनमे से एक तो 10 लाइट इयर्स दूर स्थित एक ब्राउन बौना तारा था। जिसका तापमान -120 डिग्री सेल्सियस के लगभग था। इस तरह नासा ने इस बात को अस्वीकार कर दिया कि सौरमंडल में कोई नेमसिस नाम की चीज़ नहीं है। यही नहीं कि उन्होंने यह भी बताया कि ऊट क्लाउड में 10 हजार खगोलीय इकाई की दूरी तक कोई भी शनि ग्रह जितने आकार जितना चीज़ नहीं है।

2011 में एक और थ्योरी सामने आयी। इसमें कहा गया कि जब आधुनिक जीवाश्म विज्ञान ने धरती की क्रेटर की जाँच की। तो उन्हें वहां पर ऐसे कोई भी सबूत नहीं मिले कि सामूहिक विनाश के बीच कोई आवधिकता थी।

थ्योरी का गलत होना

डेविड रैप और जैक सिकोर्स्की की खोज पर जिस सामूहिक विनाश की थ्योरी के आधार पर सभी नेमसिस की खोज में लगे हुए थे। वही थ्योरी गलत निकली। अब अभी नेमसिस का रहस्य खत्म नहीं हुआ। जो लोग अभी भी नेमसिस पर विश्वास करते है। वह मानते हैं कि साल 2021 में चिल्ली में शुरू होने वाली खोज से इसका पता लगाए जाने की संभावना है। क्यूंकि वह बहुत ही एडवांस होने वाली है।

साल 2017 में आई एक वैज्ञानिक खोज में यह दवा किया गया था कि ब्रह्माण्ड का कोई भी तारा बिना किसी साथ तारे के बन ही नहीं सकता। मतलब इसे कम से कम एक साथी तो जरूर चाहिए। अगर हम इस बात को सच माने तो हमारे सूरज का भी एक साथी तारा तो जरूर होगा।


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