क्या होता अगर पृथ्वी पर कोई भी ज्वालामुखी न होता?

क्या होता अगर पृथ्वी पर कोई भी ज्वालामुखी न होता?

हमारा ग्रह पृथ्वी, जो अंतरिक्ष से देखने पर एक नीले गेंद की तरह लगता है। कितना प्यारा और सुंदर है न हमारा ग्रह। अगर आपसे पूछा जाये कि सौरमंडल में पृथ्वी एक मात्र ऐसा ग्रह क्यों है, जो इतना सुंदर है और इस पर जीवन है।

तो ऐसे में आपका जवाब होगा कि पृथ्वी गोल्डीलॉक्स ज़ोन में है। जिस वजह से इसपर जीवन के अनुकूल परिस्तिथियाँ मौजूद है। यही कारण है कि हमारा ग्रह इतना सुंदर और हराभरा दिखाई देता है।

और अंतरिक्ष से के नीले गेंद की तरह दिखाई देता है। लेकिन अगर में आपसे कहूं, कि पृथ्वी की सुंदरता के पीछे ज्वालामुखियों का हाँथ है। तो क्या आप मेरे बातों पर विश्वास करोगे। यही नहीं अगर पृथ्वी पर ज्वालामुखी न होते, तो न पृध्वी पर जीवन होता, न वर्षा चक्र होते, न पृथ्वी पर समुद्र होते और न ही पर वायुमंडल होता।

आखिर ज्वालामुखी हमारे लिए इतने महवपूर्ण क्यों हैं?

कुल मिलाकर बिना ज्वालामुखियों के हमारी पृथ्वी वीरान और बंजर ग्रह होती। फिर भले ही यह गोल्डीलॉक्स ज़ोन में क्यों न होती। तो आखिर ज्वालामुखी हमारे लिए इतने महवपूर्ण क्यों हैं?, क्या सम्बन्ध है पृथ्वी पर मौजूद जीवन और ज्वालामुखियों का? जानने के लिए इस आर्टिकल को शुरू से पूरा पढ़े। आपको इस आर्टिकल के जरिये आपको काफी जानकारी मिल जाएगी। तो चलिए जानते हैं कि क्या होता अगर पृथ्वी पर कोई भी ज्वालामुखी न होता?

जब भी आप ज्वालामुखी के बारे में सोचते हो, तो आपके दिमाग में सबसे पहली चीज़ क्या आती है। धधकता हुआ लावा और उससे निकलने वाली गैसें, राख का काला बादल, या ज्वालामुखी के पास मौजूद गरम पानी।

पृथ्वी के अंदर की प्रक्रिया

हम सभी जानते हैं कि पृथ्वी के गर्भ में बहुत ज्यादा गर्मी है, और इसकी कोर का तापमान लगभग 6000 डिग्री सेल्सियस है। ज्यादा तापमान होने की वजह से पृथ्वी के गर्भ में सब कुछ पिगली हुई अवस्था में है, जिसे मेग्मा बोलै जाता है। जब मैग्मा पृथ्वी के अंदर स्थान-परिवर्तन करता है, तो उसकी वजह से विवर्तनिक प्लेटें भी स्थान-परिवर्तन करने लगती है। जिस वजह से पृथ्वी की सतह पर हमें भूकंप के झटके महसूस होते हैं।

जब धरती के भू गर्भ में विवर्तनिक प्लेटें खिसकती हैं और एक दूसरे से टकराती हैं। तो जो भारी प्लेटें होती हैं वह नीचे दब जाती हैं, हलकी प्लेटें ऊपर आ जाती हैं। जिस वजह से पर्वत श्रंखलाओं का निर्माण होता है।

जबकि भारी प्लेट दबने के कारण पृथ्वी के अंदरूनी हिस्से में में चली जाती है। तो वहां मौजूद ज्यादा तापमान की वजह से उस प्लेट का धातु और पत्थर पिघलकर मैग्मा में तब्दील हो जाती है। ज्यादा प्रेशर की वजह से मैग्मा हलकी प्लेट पर दवाब बनता है और एक विस्फोट के रूप में पृथ्वी की क्रस्ट को तोड़ कर मैग्मा लावा के रूप में बाहर निकलता है। जिसे हम ज्वालामुखी कहते हैं।

धातु और पत्थर, जब तक पिघली हुई अवस्था में ज़मीन के अंदर होते हैं, तब तक उसे मैग्मा बोला जाता है। और जैसे ही मैग्मा पृथ्वी के बाहर आता है, तो उसे लावा बोला जाता है।

पहाड़ों का निर्माण

पृथ्वी के सतह पर लावा के जम जाने से ज्वालामुखी के पहाड़ों का निर्माण होने लगता है। जिस जगह पर पृथ्वी की सतह ठोस होती है, और मैग्मा किसी तरह बाहर नहीं निकल पाता, और ज्वालामुखी विस्फोट नहीं हो पाता। तो धरती की ऊपरी सतह कांपती है और भूकम्पीय झटके महसूस होते है। अगर विस्फोट होता है, तो मैग्मा के साथ गैस, राख और अन्य अवशेष लावा के रूप में बाहर निकलते हैं। और सतह पर आ कर जम जाते हैं।

आज हम पृथ्वी पर जमीं देखते हैं, उसमे 80 प्रतिशत से ज्यादा ज्वालामुखियों का ही हाथ है। ज्वालामुखी तीन प्रकार के होते हैं –

सक्रिय ज्वालामुखी

यह वे ज्वालामुखी होते हैं, जिनमे समय समय पर विस्फोट होते रहते हैं। आज पूरी पृथ्वी पर लगभग 1500 से ज्यादा सक्रिय ज्वालामुखी हैं।

सुषुप्त या निद्रित ज्वालामुखी

यह वे ज्वालामुखी होते हैं, जो वर्षों से शांत हैं और सोये हुए हैं। लेकिन इनके सक्रीय होने की सम्भावना बानी रहती है। ऐसे ज्वालामुखी बड़े ही खतरनाक साबित होते हैं। लोग किसी ज्वालामुखी को शांत समझ कर उसके आस पास बस जाते हैं। और किसी दिन वह विशालकाय दानव जगता है, तो धरती हिलने लगती है।

भीतर से गड़गड़ाहट की आवाज आने लगती है। और विध्वंश लीला होने लगती है। उस विध्वंश लीला में आस पास के गाँव और नगर बर्बाद हो जाते हैं। और ऐसा कई बार हो चुका है जब शांत पड़े ज्वालामुखियों ने नगरों को ही निगल लिया।

जापान का फ्यूजीयामा, जो संसार का सबसे सुंदर ज्वालामुखी कहा जाता है। सुषुप्त ज्वालामुखी के अंदर आता है, लेकिन पता नहीं वह कब विश्वंश लीला शुरू कर दे।

जावा और सुमात्रा के बीच एक ज्वालामुखी मौजूद है, जिसका नाम है क्राकाटोआ। यह ज्वालामुखी वर्षों से शांत पड़ा था, लेकिन 1883 में इसमें एक विस्फोट हुआ। जिसने एकाएक वह प्रलय लाने वाला द्रश्य उपस्तिथ किया, जो किसी ने न तो देखा था और न ही कभी सुना था। वह विस्फोट इतना तेज़ था कीउसकी आवाज हज़ारों मीलों तक सुनाई पड़ी। आकाश में उससे इतनी धुल और राख फैली कि वह 3 सालों तक उड़ती रही।

उस समय विस्फोट से इतनी तेज़ शॉक वेव हुई कि वे तीन बार पृथ्वी की परिकर्मा कर आई। उस विस्फोट में लगभग 36000 लोग मारे गए। और पूरा का पूरा आइलैंड नष्ट हो गया।

मृत या शांत ज्वालामुखी

तीसरे प्रकार के ज्वालामुखी होते हैं मृत या शांत ज्वालामुखी, यह वो ज्वालामुखी होते हैं, जो युगो से शांत पड़े हैं। और जिसका विस्फोट एकदम बंद हो चुका है और भविष्य में इनमे विस्फोट होने की संभावना नहीं रहती।

हमारी पृथ्वी पर मुख्य रूप से सात टेकटोनिक प्लेट्स हैं और 26 सब टेकटोनिक प्लेट्स हैं। जो पूरी पृथ्वी की भूगोल को निर्धारित करती हैं। लेकिन क्या हो कि पृथ्वी पर कभी ज्वालामुखी फटा ही न होता? तो उस समय में क्या हमारी पृथ्वी वैसी ही होती, जैसे इसे आज हम देखते हैं? अगर पृथ्वी पर कोई ज्वालामुखी न होता तो इसपर वायुमंडल भी न होता। जैसा कि हम जानते हैं, कि हमारी पृथ्वी की शुरुवाती दौर में इसपर ज्वालामुखी फटने लगे। जिससे ज्वालामुखी की गैसे उससे लगी।

जिससे पृथ्वी के चारों ओर एक सुरक्षात्मक बुलबुले का निर्माण होने लगा। जिसमे पृथ्वी का वायुमंडल तैयार हो रहा था। इसी वायुमंडल की वजह से आज हम स्वास ले पाते हैं। अगर ज्वालामुखी के फटने से गैसे न निकलती तो इसपर वायुमंडल भी न बन पाता। और पृथ्वी के चारों ओर शून्य स्थान होता।

अगर पृथ्वी का वायुमंडल न होता

यह बिलकुल वैसा ही होता जैसा चाँद पर है। जैसा हम जानते हैं कि चाँद पर कोई वायुमंडल नहीं है। अगर पृथ्वी का वायुमंडल न होता तो वैक्यूम की वजह से किसी भी प्रकार की आवाज को नहीं सुन पाते।

ज्वालामुखियों की वजह से ही पृथ्वी पर समुद्र बने। जैसा की हम जानते हैं कि आज से 4 बिलियन साल पहले पृथ्वी अपना आकर ले रही थी। उस समय पृथ्वी आज की नीले गेंद की तरह तो बिलकुल भी नहीं थी। उस समय यह बेहद गर्म और लाल थी। और पृथ्वी का सारा पानी पृथ्वी के क्रस्ट के निचे कैद था।

जब इसपर ज्वालामुखी फटे, तो उनसे लावा के साथ गैसे और पानी की भाप भी निकली। भाप कंडेनसेशन की वजह से ठंडी होकर बारिश के रूप में पृथ्वी पर बरसने लगी। इस प्रक्रिया के सालों होने के बाद, इसपर समुद्रों का निर्माण हुआ और लाल पृथ्वी ने नीला गेंद की शकल ले ली।

जैसा की हम जानते हैं कि बिना पानी के पृथ्वी पर जीवन भी नहीं पनप सकता था। ज्वालामुखियों की वजह से ही पृथ्वी पर लैंडमार्क बना जिसपर आज हम सभी रहते हैं।

अगर ज्वालामुखी न फटते

आपको जान कर हैरानी होगी कि अगर ज्वालामुखी न फटते तो पृथ्वी की जमीन उपजाऊ न बन पाती। ज्वालामुखियों की वजह से पृथ्वी के गर्भ से वे खनिज बाहर निकल आये, जिससे इसकी ऊपरी सतह उपजाऊ बन पाए।

वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी पर जीवन की शुरुवात किसी ज्वालामुखी के पास गरम पानी में हुई थी। ज्वालामुखी के पास बैक्टीरिया के पनपे जीवन ने सालों तक बदलाव होते हुए जटिल रूप धारण किया। जिन्हे आज हम आधुनिक रूप में देखते है।

मतलब ज्वालामुखी न होते तो, न पृथ्वी पर वायुमंडल होता, न पानी होता और न ही इसपर जीवन की शुरुवात होती। लेकिन अब क्या हो कि पृथ्वी पर मौजूद सारे ज्वालामुखी निष्क्रिय हो जाये और कभी न फटें। तो क्या इसका हमारी जीवन शैली पर कोई प्रभाव पड़ेगा?, जैसा कि हम जानते हैं कि आज पृथ्वी पर जितने भी अलग अलग महाद्वीप मौजूद हैं, वह करोड़ों साल पहले एक ही महाद्वीप से निकले हैं, जिसे पँजिया बोला जाता है।

करोड़ो साल पहले पृथ्वी पर एक ही महाद्वीप मौजूद था। जो कि चारों ओर से समुद्र से घिरा था। पृथ्वी के सबसे अंदरूनी भाग को कोर बोला जाता है। उसके ऊपर आउटर कोर, फिर उसके ऊपर संवहन प्रवाह है। उसके बाद मैग्मा, यही मैग्मा ज्वालामुखी के रूप में बाहर निकलता है। उसे बाद है, समुद्री क्रस्ट और फिर सबसे ऊपर है हमारे समुद्र और महाद्वीपीय क्रस्ट, जिसपर हम रहते हैं।

महाद्वीप पेंजिया

यही महाद्वीपीय क्रस्ट करोड़ों साल पहले एक बहुत बड़ा महाद्वीप पेंजिया थी। पेंजिया रीजन छोटे छोटे महाद्वीपों में टूट कर अलग अलग पृथ्वी के चारो ओर बिखर गया। इसका कारण था, टेकटोनिक प्लेट्स। यह टेकटोनिक प्लेट्स टूट कर इधर उधर होने लगी और करोड़ों सालों में पृथ्वी ने आजकी भूगोल प्राप्त की।

पृथ्वी के टेक्टोनिक प्लेट्स आज भी इधर उधर हो रही है। ये बहुत ही धीमी प्रक्रिया है। इस वजह से बदलाव हमें कम समय में दिखाई नहीं देते। जब प्लेट्स इधर उधर होते हैं, तो उनकी वजह से भूकंप और ज्वालामुखी सक्रीय होते हैं। पहाड़ों का निर्माण होता है। हिमालय पर्वतों का निर्माण भी ऐसे ही हुआ है।

और चुकी पृथ्वी की टेकटोनिक प्लेट्स में बदलाव अभी भी जारी है। इस वजह से विश्व की सबसे ऊंची छोटी माउन्ट एवेरेस्ट की ऊंचाई भी बढ़ती जा रही है। जैसा कि मेने अभी बताया था कि यह एक धीमी प्रक्रिया है। जिससे हम इसे कम समय में अनुभव नहीं कर पाते। वैसे घटनाएं पृथ्वी के लिए बहुत ज्यादा अच्छी है। क्यूंकि इनकी वजह से पृथ्वी की क्रस्ट बदलती रहती है।

अगर पृथ्वी पर आज के बाद कोई भी ज्वालामुखी न फटे?

हम बात कर रहे थे की क्या हो अगर पृथ्वी पर आज के बाद कोई भी ज्वालामुखी न फटे? अगर ऐसा हुआ, तो बिना ज्वालामुखी गतिविधि के पृथ्वी के क्रस्ट के निचे परेसूरे बढ़ता जायेंगा। चुकी उस प्रेशर को निकलने के लिए अगर कोई ज्वालामुखी गतिविधि नहीं होगी। तो एक समय ऐसा आएगा, जब पृथ्वी की क्रस्ट प्रेशर को समलने में सक्षम नहीं रहेगी। जिस वजह से पृथ्वी में विस्फोट हो जायेगा और पृथ्वी छोटे छोटे भागों में टूट कर बिखर जाएगी।

मतलब ज्वालामुखी आज भी हमारे लिए उतने ही जरुरी है, जितने कि पहले थे। इतना ही नहीं ज्वालामुखियों की वजह से हमारा वातावरण भी ठंडा रहता है। अब आप कहोगे वो कैसे?

जब ज्वालामुखी विस्फोट होता है, तो उससे सल्फर गैस बाहर निकलती है। जो कि हमारे वातावरण में पानी के साथ मिलकर पृथ्वी के वातावरण को ठंडा करती है। आज हम ज्वालामुखियों को बड़े बड़े पावर प्लांट्स के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। जिनको जिओ थर्मल पावर प्लांट बोलते हैं।

ज्वालामुखी के जरिये पृथ्वी की गहराई से जो गर्माहट निकलती है। उससे पावर प्लांट्स में पानी को भाप में बदला जाता है। और उस भाप से बिजली पैदा की जाती है। ज्वालामुखियों की वजह से ही आज हम ऊँची ऊँची कंक्रीट की इमारतें कड़ी कर पाते हैं। क्यूंकि ज्वालामुखी के सामग्री से ही सीमेंट का निर्माण किया जाता है।

अंत में ज्वालामुखी हमारे लिए इतने बेकार नहीं है, जितना हम सोचते हैं। क्यूंकि आज हमारी पृथ्वी जैसी भी है, वो ज्वालामुखियों की वजह से ही है।


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