चाँद का रहस्य क्या है? चाँद की उत्पत्ति कैसे हुई?

चाँद का रहस्य क्या है? चन्द्रमा की उत्पत्ति कैसे हुई?

वैसे तो चन्द्रमा, पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है। जो कि हमारे सौरमंडल का पांचवा सबसे विशाल प्राकृतिक उपग्रह है। यह हमेशा से हम मनुष्यों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। और हमारे दिमाग में अक्सर यह सवाल उठता है, कि इस खूबसूरत चाँद की उत्पत्ति कैसे हुई?

चाँद पर मानव पहली बार कैसे पहुंचा और क्या यहां कभी मानव रहा करते थे? क्या यहाँ अब एलियंस रहते हैं? तो आज के इस आर्टिकल में हम इन सभी सवालों के जवाब आप सभी को बताएंगे।

चन्द्रमा का इतिहास और उत्त्पति

बीबीसी के रिपोर्ट के मुताबिक

सबसे पहले हम बात करते हैं, चन्द्रमा के इतिहास के बारे में और उनकी उत्त्पति के बारे में। बीबीसी के रिपोर्ट के मुताबिक, चाँद से लाये गए चट्टानों के टुकड़े के हवाले से यह बात सामने निकल कर आई। कि अरबो साल पहले एक बड़ा गृह पृथ्वी से टकराया था। इस टक्कर से बल स्वरुप चन्द्रमा का जन्म हुआ था।

हिन्दू धर्म ग्रंथों के आधार पर

चद्र्मा के टुकड़े सबसे पहले अपोलो अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा धरती पर लाये गए थे। हालाँकि अगर हम हिन्दू धर्म ग्रंथों के आधार पर देखें। तो हम पाएंगे कि चन्द्रमा की उत्पत्ति मतस्य पुराण एवं अग्नि पुराण के अनुसार, जब ब्रह्माजी ने पूरे दुनिया की रचना की कल्पना की थी। तब उन्होंने अपने मानस पुत्र ऋषि अत्रि का विवाह ऋषि काण्डक की पुत्री अनसुइया से किया। ऋषि अत्रि और अनसुइया के तीन संताने, दुर्वासा, तत्तातृण और सोम हुए। सोम देवता को ही आगे चल कर चन्द्रमा कहा जाने लगा।

हिन्दुओं की एक और धर्म ग्रन्थ, स्कंदपुराण के अनुसार

इसके अलावा हिन्दुओं की एक और धर्म ग्रन्थ, स्कंदपुराण के अनुसार। जब देवता और दानवों ने समुद्रमंथन किया, तब उस मंथन से 14 रत्न निकले। कहा जाता है कि उनमे से एक रत्न चन्द्रमा भी था। जिसे भगवान शंकर ने अपने मस्तक पर धारण किया।

ग्रीक पौराणिक कथाओं के अनुसार

इसके अलावा ग्रीक पौराणिक कथाओं के अनुसार, सीलिन की नाम थिया था। जब थिया और पृथ्वी की टक्कर हुई तो इसके बाद चन्द्रमा का जन्म हुआ। लेकिन अगर आज हम विज्ञानं की द्रिष्टी से देखें, तो यह कहना ज्यादा उचित है। कि चाँद का उदय खगोलीय टक्कट के परिणाम स्वरुप हुआ होगा।

हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि ऐसी कोई खगोलीय टक्कर कभी हुई ही नहीं। वर्ष 1980 के आस पास इस सिद्धांत को मान लिया गया। जिसमे कहा गया कि 4.5 बिलियन साल पहले पृथ्वी और थिया, जो कि एक छुद्र ग्रह है। इनके बीच टक्कर से ही चन्द्रमा बना।

यूनिवर्सिटी ऑफ गेटिंगेन के अनुसार

लेकिन किसी भी वैज्ञानिक को थिया की मौजूदगी का प्रमाण आज तक चाँद के चट्टानों में नहीं मिला। चन्द्रमा के अध्ययन करता, यूनिवर्सिटी ऑफ गेटिंगेन के डॉक्टर टेनिल हेवर्स के अनुसार। अब तक किसी को पृथ्वी और थिया के टक्कर के सिद्धांत के दमदार साबुत नहीं मिले हैं।

वैसे ओपन यूनिवर्सिटी के डॉक्टर महेश आनंद का इस शोध पर थोड़ा ऐतराज़ जताते हुए कहना है। कि मौजूदा तथ्य चाँद से लाये गए, महज तीन चटानी नमूनों के आधार पर निकला जा रहा है। वह आगे कहते हैं कि हमे इन चट्टानों को पूरे चन्द्रमा के उत्त्पति का प्रमाण मानने में सावधानी बरतनी चाहिए। और चन्द्रमा पर मौजूद सभी चट्टानों को अलग अलग विश्लेषण किया जाना चाहिए।

कुछ शोधकर्ता दवा करते हैं कि टक्कर से पहले पृथ्वी आज के अपेक्षा अधिक गति से घूमती थी। यह सिद्धांत बताता है कि चन्द्रमा और पृथ्वी की संरचनाएं एक जैसी है।

विवादित बयान

इसके अलावा चन्द्रमा की उत्त्पति के सम्बन्ध में एक विवादित बयान भी है। इस विवादित बयान के जन्मदाता नीदरलैंड के ग्रोनिंगन विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर का कहना है। कि पृथ्वी की सतह करीब 2900 किलोमीटर निचे एक नाभकीय खंडन के फलस्वरूप पृथ्वी की धूल और पपड़ी अंतरिक्ष में उडी। और इस मलबे ने इक्कठा हो कर चाँद को जन्म दिया। शायद पृथ्वी और चन्द्रमा के समय काफी मिलती जुलती है।

इसके बाद बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा था कि चन्द्रमा के निर्माण को अच्छी तरह से समझने के लिए। हमे चाँद के सतह में मौजूद चट्टानों की अपेक्षा निचे की चट्टानों पर अध्ययन करना चाहिए। क्यूंकि यह चट्टानें अंतरिक्ष में आने वाली आँधियों, खगोलीय चट्टानों से प्रदूषित नहीं हुई है।

मनुष्य चन्द्रमा पर कब और कैसे पहुंचा?

अब जानते हैं कि मनुष्य चन्द्रमा पर कब और कैसे पहुंचा? वैसे तो चन्द्रमा पर मानव अपोलो यान के द्वारा पहली बार पहुंचा था। चन्द्रमा पर मानव को भेजने का सपना अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन कैनेडी ने देखा था। और इस सपने को अपोलो के आने के माध्यम से 1969 में पूरा किया गया।

अपोलो कार्यक्रम अमेरिका की स्पेस एजेंसी नासा द्वारा पूरा किया गया। नासा जिसका पूरा नाम राष्ट्रीय वैमानिकी और अंतरिक्ष प्रशासन है। नासा का निर्माण अमेरिका के सार्वजानिक अंतरिक्ष कार्यक्रमों व वैमानिकी और अंतरिक्ष के लिए किया गया है। नासा का लक्ष्य अंतरिक्ष की खोज के साथ साथ वैमानिकी संसोधन को बढ़ाना है।

नासा का गठन 

राष्ट्रीय वैमानिकी और अंतरिक्ष प्रशासन का संक्षिप्त नाम नासा है। नासा का गठन 19 जुलाई 1958 को किया गया था। इस एजेंसी ने अक्टूबर 1958 से अपना कार्यक्रम शुरू कर दिया था। तब से आज तक यह एजेंसी लगातार काम कर रही है।

अंतरिक्ष खोजो के सभी कार्यक्रमों को इस एजेंसी की देखरेख में किया जाता है। अगर हम नासा के प्रमुख कार्यक्रमों की बात करें। टी नासा के प्रमुख कार्यक्रम, अपोलो चन्द्रमा अभियान, स्कायलैब, अंतरिक्ष स्टेशन और अंतरिक्ष शटल तक शामिल है। नासा पर पूर्ण नियंत्रण अमेरिकी सरकार का है। और इसका मुख्यालय वशिंटन डीसी में है। नासा द्वारा ही अपोलो 11 यान से 6 मानव वैज्ञानिक चन्द्रमा पर अध्ययन के लिए गए थे।

20 जुलाई 1969 को एक अमेरिकी नागरिक नील आर्मस्ट्रांग ने चन्द्रमा की धरती पर पहला कदम रखा। कुछ समय बाद अंतरिक्ष में अपोलो सोयू जाँच कार्यक्रम जाँच के लिए अमेरिका और रूस का संयुक्त राष्ट कार्यक्रम था। इसे अपोलो कार्यक्रम का भाग माना जाता है।

अपोलो अभियान पर खर्च

एक प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार 2006 तक अमेरिका अपोलो अभियान पर 135 अरब डॉलर तक खर्च कर चुका था।अपोलो यान का निर्माण 28 अरब डॉलर की कीमत लगा कर बनाया गया था। जो अब तक की कीमत के हिसाब से 100 अरब डॉलर से भी कुछ ज्यादा है। जिसमे से 16 अरब डॉलर नियंत्रण यान के लिए और 11 अरब डॉलर चंद्रयान के लिए था।

एलियंस के बारे में

अब बात करते हैं एलियंस के बारे में। कहा जाता है कि चन्द्रमा पर एलियंस दिखते हैं। यह सब समझने से पहले हमे कुछ सवालों के जवाब ढूंढने होंगे। क्या एलियंस होते हैं? अगर एलियंस होते हैं, तो कहाँ रहते हैं और वे दिखते कैसे हैं ? इन एलियंस को लेकर मानव के मन में जितने सवाल उठते हैं, उतनी ही इनके बारे में जानने की उत्सुकता और बढ़ जाती है। खगोल वैज्ञानिकों की एक नयी रिपोर्ट में दावा किया है। कि पृथ्वी की एक मात्र उपग्रह चन्द्रमा पर एलियंस रहते हैं। क्यूंकि चन्द्रमा ही एक ऐसा स्थान है जो एलियंस के रहने के लिए अनुकूल है।

अगर हम मनुष्यों की बात करें तो चन्द्रमा पर मनुष्य जीवन की उत्पाती की कल्पना भी नहीं की सकती है। क्यूंकि मानव जीवन की आवश्यक वातावरण जैसी चीज़ें चन्द्रमा पर मौजूद नहीं है। लेकिन पहले शायद ऐसा नहीं था। शोध में बताया गया है कि पहले चाँद पर जीवन रहा होगा।

करीब 4 अरब साल पहले

करीब 4 अरब साल पहले, चाँद पर जीवन होने की बाद का दावा, एक वरिष्ठ वैज्ञानिक द्वारा किया गया है। ज्वालामुखी अवशेष या मेग्मा युक्त पत्थर अपोलो 17 अभियान के दौरान धरती पर लाये गए थे।

विज्ञान पत्रिका में छपी रिपोर्ट के अनुसार वैज्ञानिकों ने इस अध्ययन के लिए चाँद से लाये गए उन मैग्मा अवशेषों का अध्ययन किया गया। जो कि शीशे जैसे पत्थर या क्रिस्टल के बीच फसे हुए है। उन अवशेषों में अब तक के अनुमानों में 100 से ज्यादा गुना पानी के अंश पाए गए हैं।

इस अध्ययन के बाद वैज्ञानिकों की रॉय है कि एक समय चन्द्रमा पर कई मील सागर जितना पानी रहा होगी। वाशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी के एक खगोल वैज्ञानिक ने माना है। कि अगर शुरुवात में चन्द्रमा पर वातावरण और पानी था, तो चाँद पर जीवन भी अवश्य रहा होगा।

चाँद पर पहला कदम रखने वाला व्यक्ति

अमेरिकी नागरिक नील आर्मस्ट्रांग पहले ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने चन्द्रमा पर कदम रखा। इसके बाद अन्य देशों के अलावा भारत के राकेश शर्मा भी चाँद पर गए। वे सभी वैज्ञानिक चन्द्रमा पर मौजूद कुछ चट्टानों के टुकड़े एवं मिटटी, धरती पर शोध के लिए ले कर आये।

चाँद की तस्वीर

लेकिन हम यहाँ बात कर रहे हैं, चाँद पर मौजूद एलियंस की। नासा ने कुछ समय पहले चाँद की तस्वीर जारी की। इन तस्वीरों को गौर से कदखने पर पता चलता है कि चाँद के एक तरफ बिलकुल काफी परछाई यानिकि अन्धकार है। और यह अन्धकार मुख्यता चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर भी पाया जाता है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक दवा किया जाता है कि एलियंस यही पर रहते हैं। इसी दक्षिणी ध्रुव पर भारत ने अपने एक काफी जटिल मशीन को 22 जुलाई 2019 को चंद्र अभियान के लिए भेजा था। यह मिशन चन्द्रमा के दक्षिणी धुर के अनछुए हिस्से के खोज के लिए गया था।

भारत की चंद्रयान 2 अभियान

भारत ने चंद्रयान 2 के माध्यम से ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर को एक साथ भेजा था। तब 7 सितम्बर 2019 को चन्द्रमा के सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग के कुछ ही मिनट पहले। लैंडर विक्रम का भारत के धरती पर स्तिथ स्पेस एजेंसी इसरो स्टेशन से अचानक सम्पर्क टूट गया। इसके बाद इसरो एजेंसी द्वारा लैंडर विक्रम से कई बार सम्पर्क करने की हर संभव कोशिश की गयी। लेकिन सम्पर्क नहीं हो पाया।

यह सोचने वाली बात है कि आखिरकर क्यों कोई भी कभी चन्द्रमा के दक्षिणी हिस्से तक नहीं पहुँच पाता। अगर कोई दक्षिणी हिस्से पर जाने की कोशिश करता है, तो उसके सारी कोशिशे कैसे नाकाम हो जाती है?

एक मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार नासा ने बताया है कि चाँद की जो तस्वीरें ली हई है। उनमे चौकोर आकर की चट्टानें जैसी दिखने वाली इमारतें पायी गयी है। हो सकता है कि यह इमारतें ही एलियंस का बसेरा हो। जो वहां पहुँचने की कोशिश करता हो उसे ही एलियंस बीच में ही रोक देते हैं।

नासा की 50वी सालगिरह पर 

दरअसल नासा ने चाँद पर मानव अभियान की 50वी सालगिरह पर करीब 400 फोटो जारी किये थे। इनमे से कुछ चौकाने वाली भी थी। नासा और गूगल अर्थ से लिए गयी वीडियो में भी एक सक्श अपने परछाई के साथ नज़र आता है। कहा जाता है कि यह सक्श कोई और नहीं बल्कि एलियन ही है। इस तस्वीर के आधार पर कहा जा सकता है कि क्या इस ब्रह्माण्ड में हम शायद अकेले नहीं है? लेकिन इस सवाल के जवाब में नासा ने कभी कोई उत्तर नहीं दिया।

तो दोस्तों, एलियंस चाँद पर रहते हैं या नहीं ये एक खोज का विषय है लेकिन एलियंस भी हमारे साथ इस ब्रह्माण्ड में मौजूद है. इस बात का एहसास हमे समय समय पर हो ही जाता है। एलियंस की मौजूदगी और उत्त्पति एक रहस्य ही है।


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