प्राचीन भारत के महान वैज्ञानिक जिन्होंने दुनिया बदल दी

प्राचीन भारत के महान वैज्ञानिक जिन्होंने दुनिया बदल दी

भारत का इतिहास बहुत ही प्राचीन है, प्राचीन समय में जब पूरी दुनिया अपना भोजन पानी जुटाने में ही व्यस्त रहती थी। उस समय विज्ञान के क्षेत्र में भारत में अद्भुत खोजें हो चुकी थी।

प्राचीन काल में भारत में लिखी कई वैज्ञानिक ग्रंथों का उल्लेख इतिहास में मिलता है। आज हम बहुत से प्रचलित वैज्ञानिक सिद्धांतों को जानते हैं। जो पिछले 300 से 400 सालों में दिए गए हैं। लेकिन इनमे से कई वैज्ञानिक सिद्धांत ऐसे हैं, जिनको हजारों साल पहले प्राचीन भारत के वैज्ञानिकों ने दिया था।

विज्ञानं के इतिहास में ऐसे कई उद्धरण मिलते हैं जिनमे भारत के कई वैज्ञानिक शामिल है। दुःख की बात तो यह यह कि उन महान लोगों की रचनाओं को न तो हम संभाल के रख पाए और न ही हम उन पर शोध कर पाए। और यह हमारी सबसे बड़ी बदकिस्मती है कि जिस भारत ने दुनिया को वैज्ञानिक सिद्धांत दिए। उन्ही वैज्ञानिक सिद्धांतों को आज विदेशी वैज्ञानिक अपने नाम पर पेटेंट करवा चुके हैं।

जब दुनिया के लोग सिर्फ अपने भोजन पानी की चिंता में ही लगे थे, तब भारत के वैज्ञानिक अंतरिक्ष के रहस्यों को सुलझाने में जुटे थे। प्राचीन भारत के वैज्ञानिक दुनिया में प्रसिद्द नहीं हो पाए। इसका कारण यह भी है कि जब आधुनिक विज्ञानं का इतिहास लिखा जा रहा था। तब भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। लेकिन जैसे जैसे भारत आज दुनिया में अपनी शक्ति है प्रदर्शन करता जा रहा है, और हमारे इतिहास की खोज होती जा रही है। वैसे वैसे हम भारत के स्वर्णिम इतिहास को दुनिया के सामने एक बार फिर से लेकर आ रहे हैं।

आज के इस आर्टिकल में हम जानेंगे, प्राचीन भारत के उन महान वैज्ञानिकों के बारे में। जो सदियों से इतिहास के पन्नो में दबे पड़े हैं। मेरा यकीं मानिये कि इसा आर्टिकल को पूरा पढ़ने के बाद आपको भारतीय होने पर बड़ा ही गर्व महसूस होगा।

आर्यभट

इनका नाम तो आप बचपन से ही सुनते हुए आ रहे होंगे और सुने भी क्यों न। क्यूंकि आर्यभट ने अपने जीवन काल में दुनिया को वो सौगात दी हैं, जिसकी वजह से आज हमारा विज्ञानं आगे बढ़ पाया।

आर्यभट प्राचीन भारत के महान खगोल शास्त्री और गणितज्ञ थे। इन्होने आर्यभटीय ग्रन्थ की रचना की। जिसमे इन्होने ज्योतिष शास्त्र के बारे में बताया। विज्ञानं और गणित के क्षेत्र में इनके कार्य आज भी वैज्ञानिकों को प्रेरणा देते हैं।

वो आर्यभट ही थे, जिन्होंने दुनिया को बीजगणित दिया, जिसको हम अलजेब्रा के नाम से जानते हैं। आर्यभट के द्वारा लिखी गयी किताब आर्यभटीय में, इन्होने खगोलशास्त्र और खगोल त्रिकोण विधि के बारे में बताया है।

जब दुनिया के कई देश ठीक तरह से गिनती गिना भी नहीं जानते थे। उस समय आर्यभट ने ब्रम्हांड के रहस्यों को दुनिया के सामने रखा। दुनिया की माने तो सोलहवीं सदी से पहले यही मन जाता था कि पृथ्वी पूरे ब्रम्हांड का केंद्र है। सूर्य, चन्द्रमा और अन्य गृह पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं। लेकिन लोगों की इस भ्रान्ति को सोलहवीं दी में निकोलस कोपरनिकस ने दूर किया।

साल 1543 में, निकोलस कोपरनिकस ने दुनिया के सामने पहल बार सोलर सिस्टम का हेलिओ सेंट्रिक मॉडल प्रस्तुत किया। जिसमे निकोलस कोपरनिकस ने बताया कि पृथ्वी ब्रम्हांड का केंद्र नहीं है। कोपरनिकस ने अपने मॉडल में सूर्य को ब्रम्हांड का केंद्र बताया। और बताया कि पृथ्वी सहित अन्य गृह भी सूर्य की परिकर्मा करते हैं।

लेकिन आर्यभट ने यह बात निकोलस कोपरनिकस से भी हजारों साल पहले ही बता दी थी। आर्यभट ने बताया कि पृथ्वी अपने धुरी पर घूमते हुए सूर्य का चक्कर लगाती है। और बाकी के अन्य गृह भी सूर्य से अलग अलग दूरी पर चक्कर लाते हैं।

आपको बता दूँ कि आर्यभट ने यह बात तब बताई थी। जब यूनानी दार्शनिक अरस्तु, यह बता रहे थे कि पृथ्वी ब्रम्हांड का केंद्र है। और सूर्य सहित बाकी गृह इसकी परिकर्मा करते हैं।

जब सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण लगता, तो प्राचीन काल में लोग मानते थे। कि किसी राक्षस ने सूर्य या चाँद को खा लिया है। लेकिन आर्यभट ने लोगों की इस अवधारणा को गलत सिद्ध किया। आर्यभट ने बताया कि क्यों चंद्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण लगता है?

इस महान वैज्ञानिक और गणितज्ञ को यह भी पता था। कि चन्द्रमाँ और दूसरे ग्रहों का खुद का कोई भी प्रकाश नहीं होता। बल्कि यह सूर्य के किरणों से प्रकाशमान होते हैं। और आधुनक विज्ञानं के हिसाब से तो यह बात हम अभी से सिर्फ 400 या 500 साल से ही जानते हैं।

जबकि आर्यभट ने तो यह सब हजारों साल पहले ही बता दिया था। आर्यभट का भारत और विश्व के गणित और खगोल विज्ञान के सिद्धांतों पर गहरा प्रभाव रहा है। भारतीय गणितज्ञों में सबसे महवपूर्ण स्थान रखने वाले आर्यभट ने 120 आर्य छंदों में खगोल विज्ञानं के सिद्धांत और उससे सम्बन्धित गणित को सूत्र रूप में अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ, आर्यभटीय में दिया है।

खगोल विज्ञानं के इस प्रकांड पंडित ने पृथ्वी के साइज को कैलकुलेट कर लिया था। आर्यभट ने पृथ्वी की परिधि को 24,835 मील बताया था। आपको यह जानकार हैरानी होगी की आर्यभट के द्वारा बताये गए पृथ्वी के इस मान में आज के हिसाब से सिर्फ 65 मील की ही शुद्धि पायी जाती है।

शून्य, जिसके बिना गणित की कल्पना करना भी मुश्किल है। इसकी खोज आर्यभट ने ही की थी। जीरो की खोज ने ही आर्यभट को विज्ञानं के इतिहास में अमर कर दिया। आर्यभट ने गणित के क्षेत्र में महान आर्कमिडीज से भी अधिक सटीक पाई के मान को निरूपित किया। यह हैरान और आश्चर्यचकित करने वाली बात है, कि आज कल के उन्नत साधनो के बिना ही उन्होंने बहुत पहले ही खगोल विज्ञानं के बारे में ज्ञान इक्कठा कर लिया था। बिना दसमलव के गणित में सटीक कैलकुलेशन करना असंभव है। लेकिन आर्यभट ने दसमलव प्रणाली दे कर गणित की कैलकुलेशन को आसान बनाया। गणित के जटिल प्रश्नों को सरलता से हल करने के लिए उन्होंने समीकरणों का आविष्कार किया। जिसको आज पूरी दुनिया इस्तेमाल कर रही है। खगोल विज्ञानं के इस प्रकांड पंडित का भारत हमेशा ऋणी रहेगा।

इसरो द्वारा लांच की गयी भारत की पहली सॅटॅलाइट का नाम आर्यभट के नाम पर ही इनको सम्मानित करते हुए दिया गया।

बौधायन

ज्योमेट्री के विषय में प्रामाणिक मानते हुए सारे विश्व में यूक्लिड की ही ज्योमेट्री पढ़ाई जाती है। लेकिन यह याद रखना चाहिए कि महान यूनानी ज्यामिति शस्त्री, यूक्लिड से पहले ही भारत में कई रेखा गणितज्ञ ज्योमेट्री के महत्वपूर्ण नियमों की खोज कर चुके थे।

उनमे से बौधायन का नाम सबसे ऊपर आता है। उस समय भारत में ज्योमेट्री को सुल्व शास्त्र के नाम से जाना जाता था। अपने पाइथागोरस प्रमेय तो पढ़ी ही होगी, समकोण त्रिभुज से सम्बन्धित यह प्रमेय पाइथागोरस ने दी थी।

लेकिन आपको जान कर आश्चर्य हो होगा कि जब पाइथागोरस ने इस प्रमेय को दिया। उससे भी कई सदियां पहले से ही भारत में इस प्रमेय को पढ़ाया जाता था। और भारत के बोधायन ही वह व्यक्ति थे, जिन्होंने इस प्रमेय को दिया था। लेकिन उन्हें कभी भी अपनी इस खोज के लिए सम्मान नहीं मिल पाया।

बोधायन के सूत्र वैदिक संस्कृत में है। बोधायन ने ज्योमेट्री में अपने और भी योगदान दिए। अब एक बात समझ नहीं आती कि विदेशी गणित शास्त्रियों ने बोधायन की ज्योमेट्री को कॉपी करके अपने नाम से प्रस्तुत किया था। या उन्होंने अपनी खुद की रिसर्च करके वह थ्योरम दी, जिनको बोधायन बहुत पहले ही अपने सुल्व शास्त्र में बता चुके थे।

महर्षि कणाद

महर्षि कणाद ने भी आधुनिक विज्ञान की नींव आर्यभट्ट की तरह ही बहुत पहले ही रख दी थी। आज हम विज्ञान में जिन नियमों को पढ़ते हैं भले ही उनका श्रेय विदेशी वैज्ञानिकों को मिले लेकिन विज्ञानं के कुछ महवपूर्ण नियम ऐसे हैं। जिनको बहुत पहले ही भारत के वैज्ञानिक महर्षि कणाद ने बता दिया था।

दुनिया भर के स्कूलों में पढ़ाया जाता है कि पदार्थ का परमाणु सिद्धांत अंग्रज वैज्ञानिक जॉन डेल्टन ने दिया था। लेकिन आपको जान कर गर्व होगा कि परमाणु की सिद्धांत के बारे में जॉन डेल्टन से भी हजारों साल पहले भारत ले महर्षि कणाद ने इस रहस्य को उजागर कर दिया था।

महर्षि कणाद ने मैटर के कण सिद्धांत को दिया, जिसको एटम बोला जाता है। महर्षि कणाद ने मैटर के सिद्धांत को कुछ इस तरह से दिया। भौतिक जगत की उत्त्पति सूक्ष्म अति सूक्ष्म कण परमाणुओं के संघनन से होती है। अगर इसको आसान भाषा में समझे तो इस दुनिया में किसी भी चीज़ की उत्पत्ति छोटे छोटे परमाणुओं के मिलने से होती है।

सर आइज़क न्यूटन के बारे में कौन नहीं जनता। न्यूटन ने ही दुनिया के ग्रेविटी के नियम के बारे में बताया। न्यूटन ने ही गति के तीन नियम बताये। आज हम अंतरिक्ष में राकेट लांच करें या पृथ्वी पर तेज गति से गाड़ियां दौड़ाये। हर जगह न्यूटन की गति के नियम काम करते हैं। या यूँ कहें कि न्यूटन के गति के नियमों को बिना हम कोई भी सॅटॅलाइट लांच नहीं कर सकते। कोई भी मैकेनिकल मशीन नहीं बना सकते। तो आप समझ चुके होंगे कि कितने जरुरी है न्यूटन के गति के तीन नियम।

क्या न्यूटन के गति का नियम, या फिर महर्षि कणाद के गति के नियम। जी हाँ, भौतिक विज्ञानं के आधार, गति के तीन नियम। महर्षि कणाद ने ही न्यूटन से सदियों पहले बता दिए थे। अब सवाल यह है कि क्या सर आइज़क न्यूटन ने गति के नियमों पर अपनी खुद की रिसर्च की थी। या फिर महर्षि कणाद के नियमों को उन्होंने मॉडिफाई किया था। खैर जो भी हो, लेकिन सच तो यही है कि आज हम गति के नियमों को न्यूटन के नाम से ही जानते हैं।

चलिए जान लेते हैं कि महर्षि कणाद ने आखिर गति के बारे में क्या बताया था। वेग पांचो द्रव्यों पर नियमित व विशेष कर्म के कारण उत्त्पन होता है। तथा नियम दिशा में क्रिया होने के कारण संयोग विशेष से नष्ट होता है या उत्त्पन होता है।

भास्कराचार्य

भास्कराचार्य , प्राचीन भारत के प्रसिद्ध गणितज्ञ और ज्योतिषी थे। आज हम जानते हैं कि गुरुत्वाकर्षण की खोज का श्रेय सर आइज़क न्यूटन को जाता है। लेकिन बहुत कम लोग ऐसे हैं जो जानते हैं कि गुरुत्वाकर्षण का रहस्य न्यूटन से भी कई सदियों पहले भास्कराचार्य ने उजागर कर दिया था।

भास्कराचार्य ने अपनी ग्रन्थ सिद्धांत शिरोमणि में पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण के बारे में लिखा है। कि पृथ्वी आकाशीय पदार्थों को विशिस्ट शक्ति से अपनी ओर खींचती है। इसी कारण आशिय पिंड पृथ्वी पर गिरते हैं।

भास्कराचार्य, ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने पूरे आत्मविश्वास से कहा था कि अगर किसी संख्या में शुन्य से भाग दिया जाये तो वह अनंत हो जाती है। और किसी संख्या को अनंत को जोड़ा जाये तो उसका परिणाम भी अनंत ही मिलता है।

भास्कराचार्य ने खगोल विज्ञानं में भी अपना योगदान दिया। और उन्होंने चंद्रग्रहण और सूर्यग्रहण के बारे में भी अपने ग्रंथों में लिखा। भास्कराचार्य ऐसे व्यक्ति थे, जो अपने समय से बहुत आगे की सोच रखते थे।

महर्षि सुश्रुत

ऐसा नहीं है कि प्राचीन भारत के वैज्ञानिकों ने सिर्फ भौतिकी, गणित या खगोल विज्ञानं में ही अपना योगदान दिया हो। चिकित्सा के क्षेत्र को कहाँ पीछे चोर सकते हैं। महर्षि सुश्रुत, प्राचीन भारत के महान चिकित्सा शास्त्री एवं शल्य चिकित्सक थे।

महर्षि सुश्रुत को शल्य चिकित्सा का जनक कहा जाता है। आपको बता दें कि प्राचीन समय से ही चिकित्सा के दो प्रमुख विभाग चलते आ रहे हैं। काय चिकित्सा यानि मेडिसिन और शल्य चिकित्सा यानि सर्जेरी। इसी के आधार पर ही चिकित्सको में भी भी चलती आ रही है।

एक काय चिकित्साक फिजिशियन और दूसरी शल्य चिकित्सक यानि सर्जन। महर्षि सुश्रुत को शल्य चिकित्सा का पितामह कहा जाता है। इन्होने एक प्राचीन ग्रन्थ लिखा था, जिसका नाम है सुश्रुत सहिता। यह ग्रन्थ आयुर्वेद के तीन मूलभत ग्रंथों में से एक है। सुश्रुत सहिता भारतीय चिकित्सा पद्दति में विशेष स्थान प्राप्त है।

महर्षि सुश्रुत ने सुश्रुत सहिता में सर्जेरी के 125 तरह के उपकरणों का जिक्र किया है। यह उपकरण सर्जेरी की जटिलता को देखते हुए खोजे गए थे। सुश्रुत ने 300 प्रकार की ऑपरेशन क्रियाओं की खोज की। इन्होने प्लास्टिक सर्जेरी करने में विशेष निपुणता हासिल कर ली थी।

महर्षि सुश्रुत आखों की सर्जेरी करने में भी निपुण थे। इन्होने सुश्रुत सहिता में मोतियाबिंद के ऑपरेशन करने की विधि को विस्तार से बताया है। उन्हें ऑपरेशन के द्वारा प्रसव कराने का भी ज्ञान था। उस समय सुश्रुत को टूटी हुई हड्डियों का पता लगाने तथा उन्हें जोड़ने में महारथ हासिल थी। सुश्रुत को उस समय डॉयबिटीज़ और मोटापे के रोगों के बारे में विशेष ज्ञान था। सुश्रुत की चिकित्सा पद्दति काफी आधुनिक थी। और आज पूरी दुनिया महर्षि सुश्रुत की चिकित्सा पद्दति का फायदा उठा रही है। हमें गर्व होता है ऐसे भारतीय वैज्ञानिकों पर जिन्हीने प्राचीन भारत में ही विज्ञानं को इतना आगे पंहुचा दिया था।

प्राचीन भारतयों द्वारा लिखे गए ग्रंथ

चलिए एक बार नजर डालते हैं, प्राचीन भारतयों द्वारा लिखे गए ग्रंथों में किन किन खोजों का जिक्र होता है। हमारे प्राचीन वेद और पुराण ज्ञान से भरे पड़े हैं।

ऐतरेय ब्रह्मनम ग्रन्थ में जिक्र होता है कि सूर्य न तो कभी अस्त होता है और न ही उदय होता है। मतलब उन्हें पता था कि सूर्य पृथ्वी का चक्कर नहीं लगता।

विष्णुपुराण में बताया गया है कि सूर्य हमेशा स्थिर रहता है। जहाँ दुनिया मानती थी कि सूर्य पृथ्वी के चारों ओर घूमता है, लेकिन भारतियों की सोच तो दुनिया से कहीं आगे थी।

ऋग्वेद और यजुर्वेद में जिक्र मिलता है कि हमारी पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है। आपको बता दूँ कि दुनिया को 400 से 500 साल पहले ही पता चला है कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगती है। जबकि भारतीय ग्रंथों में प्राचीन समय में ही इस बात का जिक्र किया जा चूका था।

प्राचीन समय में दुनिया मानती थी कि पृथ्वी समतल है, लेकिन ऋग्वेद में पृथ्वी की आकार के चपटे होने का जिक्र है। उन्हें यह भी पता था कि सूर्य की रौशनी सात रंगों से मिलकर बनी है। और उन्होंने बहुत पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि प्रकाश के बिखराओ के कारण ही आसमान नीला दिखता है।

करीब 1600 साल पहले लिखी गयी सूर्य सिद्धांत नमक किताब में सूर्य और ग्रहों की स्थान और उनके कक्षा को अनुमान लगाया गया है। और इसमें अलग अलग गृह के व्यास को भी बताया गया है।

आज से करीब 1400 साल पहले ब्रह्मगुप्त ने बताया था कि पृथ्वी की परिधि 5000 योजन है। सूर्य सिद्धांत में एक योजन की वैल्यू 8 किलोमीटर के बराबर है। इस हिसाब से पृथ्वी की परिधि 40 हजार किलोमीटर है।

वही अगर हम धरती की असल परिधि की बात करें तो वह करीब 40075 किलोमीटर है। हमारे वेद और ग्रन्थ बताते हैं कि भारत का इतिहास कितना पुराना है। भारत ने दुनिया को क्या क्या सौगात दी। भारत की इस धरा पर कितने महान लोगों ने जन्म लिया। न जाने अभी तक कितने ही प्राचीन गुमनाम वैज्ञानिकों द्वारा लिखी गयी किताबों को डिकोड भी नहीं किया जा सका।

मुझे गर्व होता है अपने भारतीय होने पर कि हम ऐसी संस्कृति में पीला बढे हैं। जहाँ से दुनिया को ज्ञान का भंडार मिला है। आज हमारे प्राचीन वैज्ञानिकों को भले ही उनकी खोजों का श्रेय न मिल पाया हो। लेकिन उनकी महान खोजो ने विज्ञानं को एक गति जरूर दी। आज दुनिया भर में लोग भारतीय ग्रंथों को विदेशी भाषाओँ में अनुवाद कर उनसे ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं। और विज्ञानं को गति दे रहे हैं।


जरूर पढ़ें: इंजीनियरिंग की उत्पत्ति कैसे हुई? शुरुआत से अभी तक

Leave a Comment