प्राचीन मानव सभ्यता कैसे लुप्त हो गई? आखिर कैसे

प्राचीन मानव सभ्यता कैसे लुप्त हो गई? आखिर कैसे:  आज इक्कीसवीं सदी में रहने वाले हम इंसान पृथ्वी पर बसने वाली उन्नत सभ्यताओं में से एक है। आज की हमारी टेक्नोलॉजी इतनी विकसित हो चुकी है कि हम दस हजार किलोमीटर की दूरी महज कुछ ही घंटों में तय कर सकते हैं।

इतना ही नहीं बल्कि आज हम अंतरिक्ष में भी अपने कदम रख चुके हैं। यहाँ तक कि चाँद और मंगल जैसी सतहों पर भी इस उन्नत सभ्यता ने अपनी बुद्धिमता के झंडे गाढ़े हैं। इक्कीसवीं सदी की इस उन्नत और समृद्ध पीड़ी ने अपनी एडवांस टेक्नोलॉजी के चलते काफी विकास किया है।

यह कहना बिलकुल भी गलत नहीं होगा कि आज का दौर पहले की तुलना में हर रूप से विकसित है। तेज़ रफ़्तार से दौड़ती गाड़ियां, बुलेट ट्रैन, गगनचुम्बी इमारतें, अंतरिक्ष यान, वायु यान तथा चिकित्सा जैसे कई क्षेत्र हैं। जहाँ आज हम पहले से कही ज्यादा एडवांस हैं।

कुछ सवाल

लेकिन अब सवाल यह है कि, क्या यह सब हमने अकेले ही किया है? या यूँ कहें कि यह ज्ञान हमें विरासत में हमरे पूर्वजों से प्राप्त हुआ है? क्या इस पृथ्वी पर यही एक मात्र मानव सभ्यता मौजूद है? या इससे पहले भी ऐसा कभी हुआ होगा कि हमसे से अधिक उन्नत मानव सभ्यताएं मौजूद रही हों? जो किसी कारण से भी नष्ट हो गया हैं।

ऐसे रहस्यों को जाने के लिए , हमारे इतिहासकार हमेशा से ही उत्सुक रहे हैं। अगर मानव इतिहास के पन्नों को पलट कर देखे तो हमें यह पता चलता है। कि इंसानियत के अतीत में कई ऐसी मानव सभ्यताएं थी, जो अपने समय से कही ज्यादा एडवांस थी। जिनके पास काफी टेक्नोलॉजी थी।

सैकड़ों सालो तक राज किया

मानव इतिहास में कई ऐसी मानव सभ्यताएं रही हैं, जिन्होंने एडवांस टेक्नोलॉजी के चलते इस धरती पर सैकड़ों सालो तक राज किया। लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि यह सभ्यताएं अचानक गायब ही हो गयी। और अपने पीछे अपने होने का सबूत छोड़ गयी। वे क्या कारण थे जिसके चलते इतिहास की एडवांस टेक्नोलॉजी वाली सभ्यताएं लुप्त हो गयी।

यह सवाल आज हमें सोचने पर मजबूर करते हैं। लेकिन आज यह हम पक्के तौर पर कह सकते हैं कि आज की हमारी उन्नत और समृद्ध सभयता का आधार कहीं न कहीं पिछली सभ्यताओं की उन्नत तकनीक की ही दें है। आज के इस आर्टिकल में हम ऐसी ही उन्नत सभयताओं के बारे में जानेंगे जो आज से कई हजार साल पहले भी मौजूद थी।

सिंधु घाटी की सभ्यता

आज से करीब आठ हजार साल पहले लगभग 2500 ईसा पूर्व। यह सभ्यता पृथ्वी पर उन्नत रूप से मौजूद थी। इस सभ्यता का विकास सिंधु और सरस्वती के किनारे हुआ था। इसी कारण इसे सिंधु घाटी की सभ्यता के नाम से भी जानते हैं। इस सभ्यता को इतिहास कार हड़प्पा सिविलाइज़ेशन भी बोलते हैं।

प्राचीन नगरी

यह सभ्यता मिश्र, मेसोपोटामिया, भारत और चीन की चार सबसे बड़ी प्राचीन नगरी सभयताओं से भी अधिक उन्नत थी। सिंधु घाटी की सभ्यता के दो प्रमुख नगर हड़प्पा और मोहनजोदड़ो अपने समय से काफी एडवांस थे।

यहाँ के लोग खेती बड़ी और अर्थव्यवस्था के बारे में काफी अधिक जानकार थे। वास्तुकार के बारे में यह लोग बहुत अधिक विकसित थे। यहाँ के घरों और राजाओं के महलों को पक्की ईटों और चिकने पत्थरों से बनाया करते थे।

यहाँ की सड़कें

यहाँ की सड़कें सुव्यवस्थित तरीके से बनी होती थी। इतना ही नहीं बल्कि सड़कों को बनाने की यह भी पक्की ईंटों का उपयोग किया जाता था। हड़प्पा के लोग जल प्रबंधन को लेकर बहुत जागरूक थे। यहाँ के लोग पानी की सप्लाई के लिए साफ़ पाइपलाइनों का इस्तेमाल किया करते थे। और इन पाइपलाइनों की बाकायदा हर एक निश्चित समय में सफाई हुआ करती थी।

यहाँ के लोग नाव बनाने की विधि, सोने, चांदी और कीमती पत्थरों से आभूषण बनाने की विधियों से भली भांति परिचित थे। इस सभ्यता के लोग पर्यावरण और स्वछता के खास ख्याल रखते थे। यह लोग गणित और ज्योतिष विज्ञानं के बारे में भी अनेक ग्रंथों से परिचित थे। लेकिन आखिर इतनी विकसित सभ्यता कैसे विलुप्त हो गयी? यह लोग आखिर गए तो गए कहा? कुछ इतिहासकार मानते यहीं कि इस सभ्यता का अंत 1800 ईसा पूर्व में ही हो गया था।

सभी इंडो यूरोपियन जन जातियों जैसे आर्यों ने सिंधु घाटी की सभ्यता पर आक्रमण कर उसे हरा दिया। वही दूसरी और कुछ इतिहासकार मानते हैं हड़प्पा सभ्यता का अंत प्राकृतिक कारणों जैसे नदियों में बाढ़ आना, पर्यावरण में बदलाव आने की वजह से हुआ होगा। उनका कहना है कि यह सभ्यता एक दम से किसी आक्रमण के होने से खत्म नहीं हुई। बल्कि प्राकृतिक बदलाव के कारण धीरे धीरे इसका पतन हुआ है।

सुमेरिया की सभ्यता

सिंधु घाटी की सभ्यता के पतन के बाद एक और उन्नत सभ्यता का उदय हुआ। जिसे आज हम सुमेरिया की सभ्यता के नाम से जानते हैं। यह सभ्यता इतिहास की उन विकसित और समृद्ध सभ्यताओं में से एक है। जिसकी तकनीकों का उपयोग आज भी किया जाता है।

इस सभ्यता को मेसोपोटामिया के नाम से भी जानते हैं। यह सभ्यता दजला और फरात नदियों के बीच विकसित हुई, इसीलिए इसका नाम मेसोपोटामिया रखा। क्यूंकि मेसोपोटामिया का अर्थ होता है दो नदियों के बीच का स्थल। अपने समय के हिसाब से इस सभ्यता ने अपना विकास काफी उन्नत तरीके से किया। इस सभ्यता के लोग गणित में बहुत तेज़ थे।

पत्थरों से ऊँचे ऊँचे भवनों का निर्माण

मेसोपोटामिया के लोग खगोलीय घटनाओ को काफी गहराई से अध्य्यन करते थे। यह लोग तारों और ग्रहों की गति से अपने दैनिक जीवन की गरणा करते थे। यहाँ के केलिन्डर का एक वर्ष 12 महीनो का होता था। लेकिन इनके महीनो का निर्धारण चन्द्रमा की गति पर आधारित था।

मेसोपोटामिया के लोग कलाकृतियों और लेखन लिपि में बहुत माहिर थे। इनकी कलाकृतियों की मिशाल आज भी प्रसिद्द है। यह लोग किसी भी कला को प्राकृतिक रूप में दिखने में बहुत माहिर थे। पत्थरों से ऊँचे ऊँचे भवनों का निर्माण तथा उनपर चित्रकारी के मिले अवशेषों से यह साफ़ तौर पर कहा जा सकता है। कि इस सभ्यता के लोग कितने कुशल और वैज्ञानिक तकनीकों से समृद्ध थे।

सभ्यता दुनिया के नक़्शे से गायब

हड़प्पा सभ्यता से कही अधिक एडवांस होने के बावजूद यह सभ्यता भी आखिरकार नष्ट हो गयी। बस अपने पीछे महज कुछ निशान छोड़ गयी, जो हमें इस सभ्यता के होने मात्र की खबर देते है। वैज्ञानिक आज तक यह नहीं समझ पा रहे कि ऐसी क्या घटना घटी थी, जिससे यह सभ्यता दुनिया के नक़्शे से ही गायब हो गयी। बताया जाता है कि प्राचीन अरब रेगिस्तान की कुछ घुमक्कड़ लोगों ने यहाँ सुमेर पर हमला किया और सुमेरिया के लोगों को हरा दिया।

इसके बाद से यह सभ्यता नष्ट हो गयी। लेकिन कुछ वैज्ञानिक इस बात से सहमत नहीं हैं, उनका कहना था कि यह सभ्यता प्राकृतिक और अपने राजनैतिक कारणों से नष्ट हुई है। लेकिन जो भी हो, आज यह सभ्यता विश्व को एक नई पहचान दे कर गयी।

बेबीलोन की सभ्यता

प्राचीन मानव इतिहास में मेसोपोटामिया का समय और बेबीलोन का उदय का समय एक ही था। सुमिरिअ की सभ्यता के बाद इसी स्थान पर एक और मानव सभ्यता का पता चला। जिसका नाम था प्राचीन बेबीलोन की सभ्यता।

इतिहासकरों के अनुसार यह बताया जाता है कि अरब रेगिस्तान के कुछ घुमक्कड़ लोगों ने जब सुमेर पर हमला करके उसे हरा दिया था। तब उसके बाद उन्होंने मेसोपोटामिया के एक शहर बेबीलोन को उसकी राजधानी बनाया। जिस वजह से इसका नाम बेबीलोन की सभ्यता पड़ा।

प्राचीन बेबीलोन वासी, आर्थिक और वैज्ञानिक दोनों ही रूप से उन्नत थे। खगोलशास्त्र और ज्योतिषशास्त्र में इस सभ्यता ने अपनी बुद्धिमता का काफी अच्छा उपयोग किया। गणित और ज्योमेट्री में भी इस सभ्यता ने बहुत विकास किया। गुणा की पद्दति की मूल कल्पना भी बेबीलोन वासियों की ही देन है।

12 राशियों, ग्रहों एवं नक्षत्रों के नाम, यहाँ तक की सप्ताह के सात दिनों के नाम इसी सभ्यता द्वारा विश्व में आज भी प्रचलित है। आज जो हमारा केलिन्डर और पंचांग है वह भी बेबीलोन वासियों के केलिन्डर पर ही आधारित है।

हैंगिंग गगार्डन

यह सभ्यता कितनी एडवांस रही होगी, इस बात का सबूत खुदाई में मिले वह उपकरण करते हैं। जो आज हमारे तकनीक से मेल खाते हैं। आपको बता दें, कि दुनिया के सात अजूबों में से एक अजूबा बेबीलोन के हैंगिंग गगार्डन को माना जाता है।

हैंगिंग गार्डन, प्राचीन इतिहास में आश्चर्यों और रहस्यों से घिरा हुआ, जिसके बनने की तकनीक आज भी एक रहस्य ही बनी हुई है। बताया जा है, कि यह गार्डन बेबीलोन के सम्राट ने अपनी रानी के लिए बनवाया था। जिसे उसके रानी को प्राकृतिक वातावरण का अनुभव होता था। हैंगिंग गार्डन का इतना विकसित और सुव्यवस्तिथ तरीके से बना होना यह दर्शाता है कि इस सभ्यता के लोगों की टेक्नोलॉजी आज की हमारी आधुनिक टेक्नोलॉजी से कही अधिक उन्नत रही होगी।

बेबीलोन वासियों ने जल घडी एवं सूर्य घडी जैसी घड़ियों का भी निर्माण किया। स्मार्ट टेक्नोलॉजी से भरपूर यह सभ्यता भी आखिरकार खत्म हो गयी। इस सभ्यता के खत्म होने का कारण वहां फैली महामारी और भुखमरी थी। बेबीलोन में कुछ जगहों पर सूखा पड़ने पर भी इस सभ्यता के नष्ट होने का एक प्रमुख कारण बताया जाता है। यहाँ के राजनैतिक कारण भी इस सभ्यता के नष्ट होने का कारण बने। और अब यह सभ्यता महज इतिहास के पाने पर ही सिमट कर रहे गयी।

मिश्र की सभ्यता

बेबीलोन के सभ्यता के बाद मानव इतिहास जिसे बहुत उन्नत सभ्यता के रूप में देखा जाता है, तो वह है मिश्र की सभ्यता। नील नदी के किनारे उत्तर पूर्व अफ्रीका के नजदीक यह सभ्यता भी काफी समृद्ध और विकसित मानी जाती है।

पेंटिंग या आर्किटेक्चर में प्राचीन मिश्र लोगों ने पूरे विश्व में अपना लोहा मनवाया है। इतना ही नहीं बल्कि यह लोग गणित और ज्यमिती रचनाओं के सिद्धांतों एम् भी माहिर थे। प्राचीन मिश्र वासियों की गणित और विज्ञानं अन्य सभ्यताओं के मुकाबले ज्यादा अच्छी थी।

गणित में ज्यमिती संकल्पनाएँ इसी सभ्यता की देन है। ज्यमिती में त्रिभुज के क्षेत्रफल और आयत के क्षेत्रफल की गरणा का सिद्धांत इसी सभ्यता द्वारा खोजै गया। गणित के क्षेत्र में इसी सभ्यता ने अन्य सभ्यताओं के मुकाबले सबसे तेज़ प्रगति और विकास किया। जोड़, घटाओ, गुणा और भाग का पूरा ज्ञान हमें इन्ही से मिला।

पाइथागोरस प्रमेय मूल

आयतों, त्रिकोण, व्रत और यहाँ तक कि चक्र के ताल क्षेत्रफल की गरणा बह मिश्र वासी स्पष्ट और बिलकुल सटीक तरीके से करते थे। पाइथागोरस प्रमेय मूल सिद्धांत की खोज भी प्राचीन मिश्र्वासिओं ने ही की थी।

गणित की इन सभी संकल्पनाओं का प्रयोग मिश्रवासी पिरामिड बनाने में किया करते थे। आपको बता दें, कि पिरामिडों की आकृति और आकार बिलकुल सटीक और स्पष्ट हुआ करते हैं।

पिरामिडों को बनाने के लिए जिस तकनीकों का उपयोग प्राचीन मिश्र वासी करते थे। यह आज भी रहस्य बना हुआ है। विशेष रूप की टेक्नोलॉजी से बने मिश्र के पिरामिड इतने रहस्य्मयी है कि आज यह विश्व के अजूबों में गिने जाते हैं।

वैसे तो मिश्र में करीब 138 पिरामिड है, लेकिन ग़िज़ा का ग्रेट पिरामिड आज के वैज्ञानिकों के लिए एक रहस्य है। प्राचीन मिश्र के लोग पिरामिडों का निर्माण राजाओं के शवों को दफ़नाने में किया करते थे। इन पिरामिडों में उन राजाओ से जुडी वस्तुओं और खाने पीने का सामान और हथियारों को भी रखा करते थे। जिससे मरने के बाद वे लोग इन सामने का उपयोग कर सकें।

जहाजों और नौकाओं का आविष्कार

इतिहासकारों का कहना है कि पानी पर चलने वाले जहाजों और नौकाओं का आविष्कार भी इसी सभ्यता क देन है। यह लोग नील नदी पर चलने के लिए, विशाल नौकाओं का उपयोग किया करते थे। यह लोग साफ़ सफाई और पानी को लेकर काफी जागरूक थे।

इतनी ज्ञानी और विकसित सभ्यता होने के बावजूद भी इस सभ्यता का अंत हो गया। इस सभयता का अंत विदेशी आक्रमणों और आपसी मतभेद होने के कारण हुआ। वहां के लोग अपने राजनैतिक प्रशासन की वजह से दो गुटों में बँट गए और लड़ाइयां शुरू हो गयी। इस प्रकार यह उन्नत सभ्यता खत्म हो गयी। परन्तु अपनी एडवांस टेक्नोलॉजी की छाप विश्व में छोड़ के चली गयी।

माया सभ्यता

यह सभ्यता उन समृद्धशाली सभ्यताओं में से एक है जिसके विकास और तकनीक ने पूरे विश्व को आश्चर्यचकित कर दिया। इतना ही नहीं बल्कि यह उन प्राचीन सभ्यताओं में सबसे आगे थी, जिसके लोगों ने बहुत ही काम समय में सब कुछ हासिल कर लिया था।

इसकी शुरुवात भले ही कैसे भी हुई हो, मगर इसके वैज्ञानिक तकनीकों ने पूरे विश्व में तहलका मचा रखा है। जहाँ तक माया सभ्यता की बात की जाये तो इसकी तुलना अन्य प्राचीन सभ्यताओं से करने पर पता चलता है कि इस सभ्यता के लोग कितने समृद्ध और कितने बुद्धिमान थे।

माया सभ्यता की गणित, लेखन और आर्किटेक्चर अन्य बाकि सभ्यताओं से कही ज्यादा उन्नत साबित करते हैं। पूरी तरह से बारिश के पानी पर निर्भर यह सभ्यता खेती करने के तरीकों में भी काफी एडवांस थी।

कलात्मक विकास का स्वर्ण युग

कई प्राचीन सभ्यताएं, जिन्होंने आज के आधुनिक युग के विस्तार और विकास में योगदान दिया है, माया सभ्यता उनमे से के एक है। अपने खगोल विज्ञानं और इंजीनियरिंग टेक्नोलॉजी के मामले में इस सभ्यता ने अपना दबदबा आज भी कायम रखा है।

ज्योतिषशास्त्र, गाना गाने, कवितायेँ और साहित्य के क्षेत्र में भी यहाँ के लोगों का कोई जवाब नहीं है। माया सभ्यता को कलात्मक विकास का स्वर्ण युग भी कहा गया है। क्यूंकि इस सभ्यता के लोगों के पास चिकित्सा ज्ञान का पूरा ज्ञान था। और इतना ही नहीं इन लोगों की पिरामिड बनाने की तकनीक मिश्र के लोगो से ज्यादा एडवांस थी।

मिश्र के लोग, मृत लोगों को दफ़नाने के लिए पिरामिड का उपयोग किया करते थे। मगर माया सभ्यता के लोग मंदिर के तौर पर पिरामिड बनाया करते थे। माया सभ्यता के लोगों का एक खास केलिन्डर होता था, जिसमे एक साल 290 दिनों का होता था। आपको बता दें, आज कि जो हमारी आधुनिक युग की प्लास्टिक सर्जरी का जो ज्ञान है, वो माया सभ्यता से ही आया है। इस सभ्यता के लोग इंसानी बालों से मानव शरीर के घावों की सिलाई किया करते थे।

कागज़ बनाने की तकनीक

इस सभ्यता के पास सब कुछ था। यह सभ्यता कागज़ बनाने की तकनीक में भी काफी उन्नत थी। पर आखिर इतनी एडवांस टेक्नोलॉजी से भरपूर यह सभ्यता कैसे विलुप्त हो गयी? बताया जाता है, कि एक समय में इन सभ्यता के कुछ नगरों की आबादी लाखों में पहुँच गयी थी। लेकिन इतनी बड़ी सभ्यता का पतन आखिर हुआ कैसे? यह बात आज भी सोचने पर मजबूर करती है।

जिस सवभ्यता के लोगों ने इसा से 800 साल पहले ही साल को 365 दिनों में बाँट दिया था। वह सभ्यता आखिर अचानक कहाँ गायब हो गयी? कुछ इतिहासकारों का मन्ना है कि स्पेन देश के आक्रमण से माया सभ्यता का अंत हुआ। लेकिन सच तो है कि माया सभ्यता के अंत की शुरुवात 900 ईसा पूर्व में ही शुरू हो गयी थी।

आखिर अचानक कैसे गायब हो गयी?

यहाँ के राजनैतिक और प्राकृतिक, दोनों ही तरीकों ने यहाँ के लोगों को पूरी तरह प्रभावित किया। लेकिन हमारे पास इस बात का कोई ठोस साबुत नहीं है कि इतनी उन्नत सभ्यता आखिर अचानक कैसे गायब हो गयी? कौन सी घटना इतनी विनाशकारी साबित हुई जिसने एक पूरे देश को ही खत्म कर दिया?

लेकिन हाल ही में हुई खोजों से यह पता चलता है कि इस सभ्यता का अंत सूखा पड़ने से हुआ। बताया जाता है, कि माया सभ्यता लगातार 100 सालों तक सूखे से जूझती रही। और अंत में ये उन्नत सभ्यता नष्ट हो गयी। लेकिन यह सभ्यता अपने पीछे बेहतरीन आर्किटेक्चर और वैज्ञानिक तकनीकों के नमूने छोड़ छोड़ गयी। जो यह साबित करते हैं कि मानव इतिहास में केवल हम ही एक उन्नत मानव सभ्यता नहीं है। बल्कि हमसे पहले भी हमरी ही जैसी या यूँ कहें कि हमसे भी अधिक एडवांस टेक्नोलॉजी वाली सभ्यताएं मौजूद थी। जिनकी वैज्ञानिक तकनीकों के आधार पर आज हमारी आधुनिक पीड़ी विकसित हो पायी है।

यह कहना बिलकुल भी गलत नहीं होगा कि आज हम जो भी हैं वो हम हमारे पूर्वजों की वजह से हैं। क्यूंकि इस बात में कोई भी शक नहीं कि हमने अपना विकास अपने पूर्वजों के ज्ञान के आधार पर ही किया।


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