बुद्धू राम की ट्रेन यात्रा

बहुत समय पहले की बात है। एक गांव था, जिसका नाम राजगढ़ था। उस गांव में सभी लोग हसी ख़ुशी अपना जीवन व्यतीत करते है। एक दिन एक डाकिया चिठ्ठी आयी चिठ्ठी आयी चिल्लाता हुआ। तभी एक घर से एक आदमी निकलता है और बोलता है चिठ्ठी आयी है। लाओ दो देखता हूँ किसकी है।

वह चिठ्ठी देख कर बोलता है, अरे यह तो मेरी अलीगढ वाली बुआ की चिठ्ठी है। वह उस चिठ्ठी को पढ़ने लगता है। उसमे उसकी बुआ ने लिखा होता है। बेटा श्याम, उम्मीद करती हूँ कि तुम और तुम्हारा परिवार सभी अच्छे से होंगे। मेरी तबियत तो आज कल बिलकुल भी ठीक नहीं रहती है।

आज हूँ और कल का पता नहीं, रहूं या न रहूं। लेकिन कुछ दिनों से तुम्हारे गांव का गुड़ खाने की इच्छा हो रही थी। मरने से पहले अगर थोड़ा सा गुड़ खा पाती। और अगर तुम एक दो दिनके अंदर भिजवा देते तो मेरी आखरी इच्छा भी पूरी हो जाती। चलो अच्छे से रहना, तेरी प्यारी बुआ अलीगढ वाली।

अलीगढ़ कौन जाएगा?

श्याम यह पढ़ कर बोलता है। अच्छा तो बुआ जी मेरे गांव का स्वादिष्ट गुड़ खाना चाहती है। लेकिन में क्या करूँ, मेरे पास इतना काम है। मेरा अलीगढ वाली बुआ जी के पास तो जाना मुश्किल ही है।

अपने नौकर बुद्धू को भेज दू अलीगढ़ या नहीं। लेकिन क्या वह जा पायेगा, अब बुद्धू ही जायेगा। अब मेने फैसला कर लिया है, अलीगढ वाली बुआ जी के पास बुद्धू ही जायेगा।

बुद्धू कहा हो?

अब श्याम बुद्धू को आवाज देता है, बुद्धू कहा हो? इधर आओ। बुद्धू अंदर से आता है और बोलता है आपने बुलाया मालिक। श्याम उससे बोला सुनो तुमको मेरी बुआजी के पास अलीगढ जाना होगा। मेरी बुआजी खजूर का गुड़ खाना चाहती है।

तुमको अभी जाना होगा अलीगढ के लिए। और हाँ ट्रैन की यात्रा करनी होगी, मतलब तुमको ट्रैन में बैठ कर अलीगढ जाना होगा। श्याम ने बुद्धू से पूछ क्या तुम ट्रैन की यात्रा कर पाओगे। पहुंच जाओगे ट्रैन से अलीगढ। बुद्धू बोला बिलकुल मालिक आराम से चला जाऊंगा। मुझे ट्रैन से यात्रा करना बहुत पसंद है।

श्याम ने बुद्धू से बोलै तो फिर जाओ और जाकर तैयार हो जाओ। में तब तक खजूर के गुड़ की व्यवस्था करके आता हूँ। इतना कहकर बुद्धू तैयार होने चला जाता है और श्याम गांव में जाकर खजूर के गुड़ की इंतजाम करने जाता है।

कुछ जरुरी बातें

अब बुद्धू को अलीगढ जाने के लिए घर से निकलता है। तभी उसका मालिक श्याम उससे बोलता है। सुनो बुद्धू, ट्रैन के अंदर बहुत भीड़ होती है। इसलिए इस गुड़ की हांड़ी का ध्यान रखना। सावधानी से लेकर अलीगढ पहुँच जाना। हांड़ी को फोड़ मत देना।

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बुद्धू बोला ठीक है मालिक, में सावधानी से अलीगढ पहुँच जाऊंगा। आप चिंता मत कीजिये। श्याम बोला ट्रैन में जैसे ही सीट मिले तो तुरंत बैठ जाना, किसी का इंतजार नहीं करना। बीच में बहुत सारे स्टेशन आएंगे। एक और बात अच्छे से सुन लो, ट्रैन की टिकट काट लेना, अलीगढ की। क्यों बुद्धू, समझ गए सभी बातें याद रहेंगी न।

बुद्धू बोला हाँ मालिक, आपकी सभी बातें मुझे याद रहेगी। में इतना भी बुद्धू नहीं हूँ। अच्छा मालिक में चलता हूँ, आशीर्वाद दीजिये मालिक। श्याम उसको शुभ यात्रा बोलकर विदा करता है।

राजगढ़ रेलवे स्टेशन

अब बुद्धू चलते चलते राजगढ़ रेलवे स्टेशन पहुंच जाता है। रेलवे स्टेशन पहुँचने के बाद बुद्धू बहुत ही खुश होता है। और बोलता है, अरे वाह कितने दिनों बाद आखिर अब में ट्रैन में बैठने वाला हूँ। मुझे तो इतना मजा आ रहा है कि में किसी को बता नहीं सकता। मेरा मन अब ख़ुशी से उछाल रहा है।

लेकिन में अपने आप पर थोड़ा काबू रखता हूँ। मालिक ने कहा है न कि मिटटी का हांड़ी टूटना नहीं चाहिए। तो मुझे इस मामले में सावधानी बरतनी चाहिए। में तो बस चुप चाप चला जाऊंगा। आखिर मेरे पास बहुत बुद्धि है और मेरे पास बहुत दिमाग है।

टिकट काउंटर

अब बुद्धू चलते चलते टिकट लेने के लिए टिकट काउंटर पहुंच जाता है। और देख कर बोलता है, अरे बाप रे बाप कितनी लम्बी लाइन है यहाँ तो। टिकट लेने के लिए खिड़की तो मुझे दिखाई ही नहीं दे रही है।

अब देखता हूँ लाइन में लग कर। इसके बाद बुद्धू टिकट लेने के लिए लाइन में सबसे पीछे लग जाता है। देखते ही देखते उनको चार घंटे बीत जाते हैं। आखिर उसका टिकट लेने का नंबर आ ही जाता है।

टिकट मास्टर

टिकट मास्टर बुद्धू से बोलता है कि आपको कहाँ कि टिकट चाहिए। बुद्धू बोलता है ट्रैन की टिकट चाहिए। टिकट मास्टर बोलता है अरे बुद्धू तुमको जाना कहा है। बुद्धू बोलता है अरे यही पर पास में है न, अलीगढ। तब टिकट मास्टर उसको अलीगढ की टिकट दे देता है।

बुद्धू टिकट लेकर बहुत खुश होता है और बोलता है अब तो मुझे टिकट को काटना होगा। फिर वह कैंची की तलाश में पूरे रेलवे स्टेशन पर सबसे पूछने लगता है। फिर पूछते पूछते वह एक दूकान पर जाता है। और उस दुकान वाले से बोलता है भैया ये अलीगढ जाने के लिए ट्रैन कहा से मिलेगी। वह दूकान वाला कहता है यही खड़े रहो ट्रैन आ जाएगी।

टिकट काट लेना

इसके बाद बुद्धू उसी दूकान वाले से कैंची मांगता है। तब वह उसको कैंची दे देता है। और बुद्धू अपनी टिकट उस कैंची से बीचो बीच काट डालता है। तभी दूकान वाला बुद्धू से बोलता है अरे भैया तुम ये क्या कर रहे हो। बुद्धू बोला अरे भैया टिकट काट रहा हूँ।

मेरे मालिक ने मुझसे कहा है। बुद्धू ध्यान से टिकट काट लेना। और बुद्धू हस्ता हुआ वहां से आगे बढ़ जाता है जहाँ से उसको ट्रैन में बैठना था।

ट्रैन चलने लगी

तभी अचानक ट्रैन आ जाती है। बुद्धू ट्रैन को देख कर बहुत खुश होता है। उसी समय बुद्धू को एक आदमी पीछे से देख रहा होता है। जिसकी नजर बुद्धू के हांड़ी पर थी। जैसे ही ट्रैन स्टेशन पर रुकी उसमे धक्का मुक्की होने लगी। और जो आदमी पीछे से बुद्धू को देख रहा था।

वह बुद्धू को धक्का देकर ट्रैन में चढ़ गया। अब ट्रैन चलने लगी और बुद्धू ट्रैन में नहीं चढ़ पा रहा था। तभी अचानक से वह एक आदमी बुद्धू का हाथ पकड़ कर ट्रैन के अंदर खींच लेता है।

आदमी जो बुद्धू का पीछा कर रहा था

ट्रैन के अंदर आने के बाद बुद्धू बहुत खुश होता है। उसको सीट न मिलने की वजह से वह अपनी हांड़ी को अपने सिर पर रख कर खड़ा रहता है। और बोलता है, अरे बाप रे बाप इतनी भीड़। वैसे मेरी हांड़ी को पकड़ कर किसने खींचा। लेकिन उसको बहुत बड़ा उपकार होगा। हांड़ी की वजह से में भी ट्रैन में चढ़ गया।

और हाँ मालिक ने कहा है हांड़ी को अच्छे से सम्हाल कर रखना। क्यूंकि खजूर की बात है न। तभी वह आदमी जो बुद्धू का पीछा कर रहा था। उसके मुँह में पानी आ गया। वह सोचने लगा, क्या बात है इसकी हांड़ी से खाने की खुशबू आ रही है। इस हांड़ी को चुराना ही होगा।

कुछ सीट खाली हो जाती है

अब ट्रेन एक स्टेशन पर रूकती है। जहाँ पर कुछ सीट खाली हो जाती है। बुद्धू देखता है कि सीट खली हो गयी है। तब वह बोलता है, अरे वाह एक जगह खली मिली है। बैठ जाता हूँ जा कर। तभी अचानक पीछे से वह आदमी आ कर बुद्धू से बोलता है अरे हटो यहाँ से।

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यह सीट तुम्हारे जैसे लोगो के बैठने के लिए नहीं है। बुद्धू बोला क्यों चाचा जी में तो पहले बैठा न। सीट पर बैठने के लिए मेने पूरे पांच रूपए दिए है। वह आदमी बोला, यह सीट उसके लिए है, जिसके सर पर बाल नहीं है। देखो इधर लिखा भी है, पढ़ो पढ़ो।

लेकिन बुद्धू बाद फोटो में एक गंजे आदमी को देख कर उस आदमी से बोलता है। अरे हाँ चाचा जी सही कह रहे हो। यह सीट सिर्फ टकले लोगो के लिए है। अच्छा मेरे तो बाल है इसलिए मुझे तो फ़िलहाल खड़ा ही रहना होगा। बुद्धू सोचने लगता है, अभी भी मुझे बहुत कुछ जानना बाकि है।

दोस्तों में आपको बता दूँ कि उस वह तस्वीर एक तौर से प्रचार था। जो कि बालो के तेल का था। वह आदमी बुद्धू को बेवकूफ बना कर उस सीट पर बैठना चाहता था।

हांड़ी उस आदमी को दे दिया

वह आदमी बुद्धू से बोला तुम इस हांड़ी को लेकर कितनी देर से खड़े हो। तुमको समस्या नहीं हो रही है। बुद्धू बोला थोड़ समस्या तो हो ही रही है। आपने सही बात बोला टकलू चाचा।

वह बुद्धू से बोला एक काम करो वह हांड़ी मुझे दे दो। में पकड़ लेता हूँ। बुद्धू बहुत खुश हुआ। और वह हांड़ी उस आदमी को दे दिया। और बोला कि आपका बहुत धन्यवाद्, में अब थोड़ा सा सो लेता हूँ। वह आदमी बोला ऐसे ही खड़े खड़े सो जाओगे तुम। बुद्धू बोला खड़े खड़े और बैठे बैठे, कैसे भी सो लेता हूँ। मुझे सोना बहुत अच्छा है। वह आदमी बोला हाँ हाँ सो जाओ।

बुद्धू सो जाता है

अब बुद्धू सो जाता है और ट्रेन चलती जाती है। तभी ट्रेन चलते चलते एक स्टेशन पर रुक जाती है। और वह पर वह आदमी बुद्धू की हांड़ी लेकर चुपके से उतर जाता है। ट्रेन फिर से चल देती है और बुद्धू बस सोता ही रह जाता है। सभी स्टेशन एक एक करके निकलते जाते हैं। लेकिन बुद्धू बस सोता ही रहता है।

अब ट्रेन एक स्टेशन पर जाकर रुक जाती है। और पूरी ट्रेन खली हो जाती है, पर फिर भी बुद्धू सोता ही रहता है। तभी अचानक एक टिकट कलेक्टर ट्रेन में देखता है कि एक आदमी सो रहा है। वह ट्रैन के अंदर चढ़ कर बुद्धू को जगाता है।

बुद्धू फूट फूट कर रोने लगा

बुद्धू उठते ही उससे पूछता है अरे भैया अलीगढ आ गया क्या? टिकट कलेक्टर बोला अलीगढ तो कब का निकल गया। यह तो मानिकपुर है। तुमको कहा जाना है। बुद्धू यह सब सुन कर रोने लगा। और बोलने लगा, ये क्या सर्वनाश कर दिया मेने।

अब तो मेरे पास एक रूपए भी नहीं है। में वापस घर कैसे जाऊंगा। बुद्धू फूट फूट कर रोने लगा। और बोला मेरा खजूर का हांड़ी भी नहीं दिख रहा है। लग रहा है वह टकलू ले कर चला गया।

टिकट तो फटा हुआ है

फिर जैसे तैसे टिकट कलेक्टर ने उसको चुप करवाया। और बोला चलो अब अपना टिकट दिखाओ। फिर बुद्धू अपना टिकट दे देता है। और टिकट देख कर वह बोला अरे यह क्या आपका टिकट तो फटा हुआ है। बुद्धू बोलै यह फटा हुआ टिकट नहीं कटा हुआ टिकट है।

मेरे मालिक ने कहा था कि टिकट काट लेना। इसलिए मेने कैची लेकर टिकट काट दिया और फिर से रोने लगा। कहने लगा मुझे अपने मालिक के पास जाना है। मुझे उनके पास भेज दीजिये। टिकट कलेक्टर बोला अरे यह केसा पागल आदमी है। उसने बुद्धू से पूछा तुमको कहाँ पर जाना है और तुम्हारे मालिक का घर कहाँ पर है।

बुद्धू बोला मुझे राजगढ़ जाना है और कह कर बोला मुझे अपनी टाई दे दो नाक पोछना है। बुद्धू की सब बात सुनने के बाद टिकट कलेक्टर बोला इसी ट्रैन में बैठे रहो। यह वापस उसी जगह जाएगी। और हाँ इस बार तुम सोना मत।

ट्रेन वापस राजगढ़ के लिए रवाना

बुद्धू फिर से ट्रेन में बैठ कर रोने लगा। और ट्रेन वापस राजगढ़ के लिए रवाना हो गयी। और आखिर बुद्धू जैसे तैसे राजगढ़ अपने मालिक के घर पहुंच ही गया। वहां पहुंचते ही मालिक के सामने बुद्धू फूट फूट कर रोने लगा।
मालिक ने पूछा क्यों बुद्धू क्या हुआ?

मेरी बुआजी के पास खजूर की हांड़ी पंहुचा आया क्या? बुद्धू बोला मुझसे एक छोटी सी भूल हो गयी है मालिक। और सब कुछ बता देता है। फिर क्या था अब तो बुद्धू की खैर नहीं थी। उसका मालिक उसको मरने के लिए पूरे गांव घूम जाता है। और कहानी इधर ही समाप्त हो जाती है।

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