संतरा वाली की कहानी

गीता नाम की एक महिला अपने छोटे से बच्चे के साथ रहती थी। गीता की शादी हुए ज्यादा वक़्त नहीं हुए थे। जब उसको बच्चा होने वाला था। तभी उसके पति का देहांत हो गया।

गीता का पति ट्रेनों में नमकीन बिस्कुट बेचा करता था। अब गीता के घर में कमाने वाला उसके अलावा कोई और नहीं था। इसलिए गीता मजबूरी के कारण अपनी बेटी को साथ में लेकर संतरा बेचने लगी। संतरे ले लो संतरे, मीठे मीठे संतरे। गीता ट्रेन में आवाज लगाती हुई जा रही थी।

तुम्हारे संतरे कुछ ज्यादा महंगे है

ट्रेन में भीड़ भी बहुत थी। वह अपने बच्चे का ध्यान रखते हुए आवाज लगते लगते आगे बढ़ती जा रही थी। तभी राज नाम का एक आदमी गीता को बुलाया। वह उससे संतरे के दाम पूछने लगा। गीता ने संतरे के साम 80 रूपए दर्जन बताए। वह बोली बहुत मीठे संतरे हैं, एक बार खा करके देखो तभी लेना।

राज बोला तुम्हारे संतरे कुछ ज्यादा महंगे है। 50 रूपए दर्जन के हिसाब से दोगी तो में दो दर्जन ले लूंगा। गीता बोली 50 रूपए दर्जन अगर में आपको दूंगी तो मुझे क्या बचेगा? 50 रूपए तो मेरी खरीदी भी नहीं है। फिर राज बोला तो ठीक है तुम मुझे सिर्फ एक दर्जन संतरे ही दे दो। उसके बाद गीता एक दर्जन संतरे राज को दे कर, अपने बाकी संतरे बेचने के लिए आगे बढ़ जाती है।

संतरे के लिए बहस

आगे चलते चलते बहुत सारे लोग गीता को संतरे खरीदने के लिए आवाज लगाते हैं। लेकिन कोई 20 रूपए तो कोई 30 रूपए में संतरा मांगते हैं। कुछ देर बाद एक रमा नाम की एक औरत गीता को रोकती है। और गीता से बोलती है, अरी संतरे वाली एक दर्जन संतरे कितने के दिए?

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गीता एक दर्जन संतरे की कीमत 80 रूपए बताती है। रमा बोली तुम्हारे संतरे तो कुछ ज्यादा ही महंगे है। इतने ज्यादा दाम तो कहीं नहीं सुना मेने। अगर तुम इतने महंगे संतरे बेचोगी तो ट्रैन का वक़्त खत्म होने तक भी तुम्हारे सारे संतरे बिक नहीं पाएंगे। सब के सब खराब हो जायेंगे।

मेहनत

गीता बोली ऐसा मत बोलिये मैडम। हम मेहनत करके दिन रात ट्रैन में संतरे बेचते हैं। हमें भी तो कुछ मुनाफा मिलना चाहिए। रमा बोली यहाँ कोई ऐसे ही नहीं बैठा। हम भी काम करते हैं, तभी हमें भी पैसा मिलता है। 40 रूपए में एक दर्जन संतरे देना हो तो दो। गीता बोली मैडम इस कीमत में तो मेरा बहुत नुक्सान हो जायेगा। में नहीं दे सकती।

गीता की इन सभी बातें सुनने के बाद रमा को बहुत गुस्सा आया। वह गुस्से में गीता से बोली अरे देखो तो कितने घमंड में बात कर रही है। भलाई का तो कोई जमाना ही नहीं है। इतना घमंड हो तो किसी को व्यपार ही नहीं करना चाहिए। बड़े बड़े व्यापारी भी छूट देते हैं। तुम तो एक मामूली संतरे बेचने वाली हो। फिर भी तुमको इतना घमंड क्यों है?

रमा की दोस्त सीता 

इतना सब कुछ बोलने पर रमा की दोस्त सीता बोली रमा तुम ऐसे क्यों कह रही हो। गीता तुमसे कोई भीख नहीं मांग रही है। वह तो मेहनत कर रही है, अपने छोटे से बच्चे को पलने के लिए। आप जहाँ पर बैठे हो वहां पर आ कर आपको संतरे बेच रही है। और रमा तुम कह रही हो कि इतना दाम कही नहीं है।

हम मॉल में पैक किये हुए संतरे लेते हैं। तो उसमे लगभग दो से तीन संतरे खराब ही निकलते है। वो तो सभी दुगना दाम देकर खरीद लेते हैं। देखो उसके पास में सभी संतरे कितने ताजे हैं। हम जब मॉल से खरीदते हैं। तब 20 रूपए का फल 40 रूपए में खरीद लेते हैं।

पैकिंग का सामान होगा तो महंगा लेकिन अगर ताजा बेचो तो खराब होता है क्या? सीता ने गीता से कहा बहिन आप मुझे एक दर्जन संतरे दे दो। गीता संतरे देते हुए बोली मैडम आपने बहुत अच्छे से बात किया। भगवान् आपका हमेशा भला करे।

एक लड़के ने आवाज लगाया

अब गीता संतरे बेच कर आगे बढ़ी तभी उसको एक लड़के ने आवाज लगाया। जो बढ़िया सूट बूट पहन कर बैठा हुआ था। और उसका नाम रॉकी था। गीता उसे बोली बेटा संतरे ले लो। ताजे ताजे मीठे और रसीले संतरे हैं।

रॉकी बोलै मैने तुमको बुलाया है क्या? दूर हो जाओ तुम यहाँ से। कभी अपने आप को देखा है, तुम्हारे कपड़ो से कितनी बदबू आती है। चलो जाओ यहाँ से। तुम्हे लगता होगा, तुम्हारी छोटी सी बच्ची को देख कर सब तुम पर तरस खाएंगे।

हालात

गीता बोली देखो बेटा तुम्हे संतरे लेने हो तो लो। वरना सीधे मना कर दो। तुम हमारे हालात के बारे में नहीं जानते। अगर मुझे तरस खा कर पैसे कमाने होते तो में भीख मांग कर कमा लेती। में मेहनत करके अपना गुजारा कर रही हूँ।

जरा सोच समझ कर बोला करो। रॉकी बोला अब क्या यह सब भी मुझे तुमसे ही सीखना पड़ेगा। यह सब कुछ मेरी माँ की वजह से हो रहा है।

मुझको उपदेश दे रही है

रॉकी गुस्से में उठा और अपनी माँ के पास जा कर बोला देखो यह सब कुछ आपकी वजह से हो रहा है। मेने आपको कितना समझाया था कि ट्रेन से यात्रा नहीं करो। लेकिन आप मानती ही नहीं। और मुझे अपने साथ इस ट्रेन में बैठा लिया।

देखो क्या हो रहा हैं मेरे साथ, संतरे बेचने वाल भी मुझको उपदेश दे रही है। में अब इस ट्रैन से कभी भी यात्रा नहीं करूँगा। अगले स्टेशन पर में उतर जाऊंगा और आप मैनेजर को फ़ोन करके कह दो कि अगले ही स्टेशन पर कार लेकर आ जाये।

जिंदगी की सच्चाई

रॉकी की माँ मीरा बोली बेटा हुआ क्या है? इतने गुस्से में क्यों हो? उसके बाद रॉकी ने सारी बातें अपनी माँ को बता दी। मीरा बोली बेटा क्या तुम जानते हो। में आज तुमको जबरदस्ती ट्रैन में लेकर क्यों जा रही हूँ?

क्या मुझे इतनी भीड़ में जाने का शौख है? नहीं बेटा, में तुमको जिंदगी की सच्चाई को दिखाना चाहती हूँ। जिससे तुम ये जान लो कि लोग किस हालात में और कैसे अपना जीवन व्यतीत करते हैं।

बातें सुनकर हैरान

बचपन से लेकर आज तक तुमने हमसे जो माँगा। वह सब कुछ हमने तुमको दिया। तुम्हारी पढ़ाई में भी किसी प्रकार की कसर नहीं छोड़ी। लेकिन असल जिंदगी क्या होती है? यह तुम आज तक नहीं जान पाए हो। देखो इन सबकी तकलीफ क्या होती है? तुमको उस औरत से घिन आ रही थी। क्यूंकि वह गरीब है और पसीने से लतफत है।

अपने बच्चे को गोद में उठा कर वह बेचारी संतरे बेच रही है। लेकिन एक वक़्त था, जब में भी तुमको गोद में बिठा कर फल बेचती थी। यह बात तुमको पता नहीं होगी। रॉकी अपनी माँ की बातें सुनकर हैरान हो जाता है। रॉकी अपनी माँ मीरा से बोलता है, नहीं माँ मुझे आपकी इन बातों पर भरोसा नहीं हो रहा है। अगर आप फल बेचते तो हमारे पास इतना पैसा कैसे हुआ।

बहुत धनवान व्यक्ति

तुम जानते हो ना बेटा, तुम्हारे दादाजी बहुत धनवान व्यक्ति थे। उनके बिना मर्जी के मेने और तुम्हारे पिताजी ने शादी की थी। तुम्हारे जन्म के बाद तुम्हारी दादी हमें उनके घर पर ले कर चली गयी।

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उसके कुछ दिन बाद तुम्हारे पिताजी की विदेश में नौकरी लग गयी। तो वह हमसे यह कह कर चले गए कि वहां पर सब कुछ ठीक होने के बाद हमें यहाँ से लेकर जायेंगे। तुम्हारे पिताजी के विदेश जाने के बाद तुम्हारे दादी ने हमें धक्के दे कर घर से बाहर निकाल दिया।

मेहनत की राह दिखाई

उसके बाद लाचार होकर में आत्महत्या करने ट्रेन की पटरी पर बैठ गयी। दूर से एक ट्रेन आ रही थी कि अचानक से एक फल वाली गरीब औरत ने मुझे खींच कर बचा लिया। बाद में उसने मेरे बारे में सब कुछ जान कर मेहनत की राह दिखाई।

उस दिन के बाद से मेने तुम्हे गोदी में उठा कर रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड पर फल बेचना शुरू कर दिया।  फिर एक दिन अचानक से तुम्हारे पिताजी विदेश से घर लौटे। जब उनको यह बात पता चली कि हम दोनों को घर से निकाल दिया गया है। वह हमें ढूंढने लगे। और फिर एक दिन उन्हें हम दोनों रेलवे स्टेशन पर मिल ही गयी।

मुझे माफ़ कर देना

फिर कुछ ही दिनों में तुम्हारे पिताजी हमें लेकर विदेश में चले गए। भगवान् की कृपा से आज हम सभी बहुत सुखी हैं। अपनी माँ की पूरी बातें सुनकर रॉकी के अंधों में आसूं आ गए।

वह अपनी माँ से बोला मुझे माफ़ कर देना माँ। में यह सभी बातें नहीं जानती था। मेने उस औरत से बहुत ही बतमीज़ी से बात की। में अभी उनसे जाकर माफ़ी मांग लेता हूँ। मीरा अपने बेटे रॉकी से बोली चलो बेटा में भी तुम्हारे साथ चलती हूँ।

बड़े शहर में बस गए

अब दोनों माँ बेटे गीता को ढूंढते ढूंढते उसके पास पहुंच जाते हैं। मीरा उस औरत को देख कर बहुत हैरान हो जाती है। मीरा बोली गीता तुम कितने दिन बात दिखाई दे रही हो। अरे मेने तुम्हे कहा कहा नहीं नहीं ढूँढा। भगवान् की कृपा से हम विदेश से आ कर एक बड़े शहर में बस गए हैं।

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तुम्हारी माँ कहाँ है? मौसी के कारण ही तो हम आज ख़ुशी ख़ुशी अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। मौसी नहीं होती, तो आज हम इस दुनिया में नहीं होते। रॉकी ने गीता से माफ़ी मांगी और बोला कि मेने आपसे बहुत बतमीजी से बात की थी। मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था। आप मुझे माफ़ कर दीजिये।

जिम्मेदारी

गीता बोली कोई बात नहीं बेटा। आज तुम मुझसे बेहेस नहीं करते तो मेरी बचपन की सहेली नहीं मिलती। मीरा दीदी लगता है, तुमने माँ के बारे में इसे बहुत बढ़ा चढ़ा कर बताया है। माँ ने तो सिर्फ बातों से तुम्हारा हौसला बढ़ाया था। और तुमने उसे सुना भी था।

मीरा बोली उन्ही बातों ने तो हमें आज तक जिन्दा रखा है। और आज से तुम्हारी बेटी की सारी जिम्मेदारी हमारी, मना तो बिलकुल भी मत करना। चलो हमारे साथ, मेरे मन को भी शांति मिलेगी। गीता, मीरा के साथ जाने के लिए तैयार हो जाती है। मीरा, गीता को अपने घर लेकर गयी और उसने गीता को एक बढ़िया सी फल की दूकान लगवा दी। जहाँ पर बैठ कर गीता फल बेचा करती है। और सभी खुशी ख़ुशी रहने लगे।

इस कहानी से सीख

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें हमेशा दुसरो की मदद करनी चाहिए। उनके परेशानियों को कम करने की अपनी पूरी कोशिश करनी चाहिए। हमें कभी भी किसी की मजबूरी का फायदा नहीं उठाना चाहिए।

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